युवा प्रोफेशनल्स को कंपनी के Health Cover (हेल्थ कवर) के अलावा खुद का स्वास्थ्य बीमा क्यों खरीदना चाहिए? | BeYourMoneyManager

युवा प्रोफेशनल्स को कंपनी के हेल्थ कवर के अलावा खुद का स्वास्थ्य बीमा क्यों खरीदना चाहिए?

आजकल ज्यादातर युवा प्रोफेशनल्स अपनी कंपनी द्वारा दिए गए ग्रुप हेल्थ इंश्योरेंस पर निर्भर रहते हैं। वे सोचते हैं कि जब तक जॉब है, तब तक मेडिकल कवर सुरक्षित है। लेकिन क्या यह पर्याप्त है? जवाब है – नहीं।

कंपनी का हेल्थ कवर नौकरी से जुड़ा होता है। जॉब बदलने, छंटनी, सैबेटिकल या खुद का बिजनेस शुरू करने पर यह कवर तुरंत खत्म हो जाता है। मेडिकल महंगाई लगातार बढ़ रही है। एक गंभीर बीमारी या दुर्घटना आपके सालों के बचत को खत्म कर सकती है। इसलिए युवा उम्र में ही अपना व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा खरीदना समझदारी भरा कदम है।

कंपनी के हेल्थ कवर की सीमाएं

कंपनी का ग्रुप मेडिकल इंश्योरेंस सुविधाजनक लगता है, लेकिन इसकी कई कमियां हैं:

कवर सिर्फ रोजगार तक सीमित रहता है।

अक्सर सम इंश्योर्ड कम (3-5 लाख रुपये) होता है, जो बड़े शहरों में बड़े इलाज के लिए पर्याप्त नहीं।

रूम रेंट लिमिट, सब-लिमिट और को-पेमेंट जैसी शर्तें लागू हो सकती हैं।

नो क्लेम बोनस या पॉलिसी निरंतरता का फायदा व्यक्तिगत रूप से नहीं मिलता।

माता-पिता या परिवार के सदस्यों को कवर नहीं मिलता (जब तक कंपनी विशेष रूप से शामिल न करे)।

इन वजहों से युवा प्रोफेशनल्स को कंपनी कवर को सिर्फ अतिरिक्त सुरक्षा मानना चाहिए, मुख्य सुरक्षा नहीं।

युवा उम्र में खुद का हेल्थ इंश्योरेंस खरीदने के फायदे

कम प्रीमियम: उम्र और स्वास्थ्य प्रीमियम तय करने वाले मुख्य कारक हैं। 25-30 साल की उम्र में खरीदने पर प्रीमियम काफी कम होता है। बाद में खरीदने पर यह बढ़ जाता है।

वेटिंग पीरियड पूरा हो जाता है: प्री-एक्सिस्टिंग डिजीज और कुछ बीमारियों के लिए वेटिंग पीरियड 2-4 साल का होता है। युवा और स्वस्थ रहते हुए यह पीरियड पूरा कर लें, तो बाद में जरूरत पड़ने पर आसानी से क्लेम मिल सकता है।

मेडिकल अंडरराइटिंग आसान: युवा उम्र में स्वास्थ्य अच्छा होने पर पॉलिसी आसानी से मिल जाती है। बाद में कोई बीमारी होने पर अतिरिक्त लोडिंग या रिजेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।

नौकरी बदलने पर भी सुरक्षा बनी रहती है: व्यक्तिगत पॉलिसी आपके साथ रहती है। जॉब चेंज, ले-ऑफ या फ्रीलांसिंग में भी कवर जारी रहता है।

नो क्लेम बोनस और सम इंश्योर्ड बढ़ता है: बिना क्लेम किए साल दर साल कवर बढ़ता जाता है।

टैक्स बेनिफिट: सेक्शन 80D के तहत प्रीमियम पर टैक्स छूट मिल सकती है (वर्तमान नियमों के अनुसार)।

कितना कवर खरीदें? बड़े प्लान की जरूरत नहीं

20 के दशक में बहुत बड़ा सम इंश्योर्ड खरीदने की जरूरत नहीं। बजट सीमित होता है – किराया, लोन, इमरजेंसी फंड और निवेश भी जरूरी हैं। 

एक व्यावहारिक तरीका:

बेस प्लान में 5-10 लाख रुपये का सम इंश्योर्ड लें (शहर और परिवार के अनुसार)।

बाद में आय बढ़ने पर सुपर टॉप-अप प्लान जोड़कर कवर बढ़ाएं।

50-30-20 नियम अपनाएं – आय का 50% जरूरतों, 30% चाहतों और 20% बचत/निवेश पर खर्च करें। इंश्योरेंस को जरूरतों में शामिल करें, लेकिन बजट से ज्यादा न लें।

पॉलिसी खरीदते समय किन बातों पर ध्यान दें?

सम इंश्योर्ड**: अपने शहर के अस्पताल खर्च के हिसाब से पर्याप्त हो।

वेटिंग पीरियड**: प्री-एक्सिस्टिंग और स्पेसिफिक डिजीज का समय चेक करें।

रूम रेंट लिमिट और को-पेमेंट**: ये क्लेम अमाउंट को प्रभावित करते हैं।

एक्सक्लूजन और सब-लिमिट**: कौन-कौन से इलाज कवर नहीं हैं।

पोर्टेबिलिटी**: बाद में पॉलिसी बदलने की सुविधा।

नेटवर्क हॉस्पिटल्स**: कैशलेस सुविधा वाले अस्पताल।

क्लेम सेटलमेंट रेशियो**: कंपनी की विश्वसनीयता देखें।

निष्कर्ष: आज का छोटा कदम, कल की बड़ी सुरक्षा

युवा प्रोफेशनल्स के लिए स्वास्थ्य बीमा सिर्फ खर्च नहीं, बल्कि लंबी अवधि की वित्तीय सुरक्षा है। कंपनी का कवर अच्छा बोनस है, लेकिन अपना पर्सनल प्लान होना जरूरी है। स्वस्थ रहते हुए खरीदें, वेटिंग पीरियड पूरा करें और भविष्य की मेडिकल महंगाई से बचाव करें।

शुरुआत छोटे और किफायती प्लान से करें। आय बढ़ने के साथ कवर बढ़ाते रहें। सही प्लान चुनने के लिए कई कंपनियों की तुलना करें और जरूरत पड़ने पर वित्तीय सलाहकार से बात करें।

अपनी वित्तीय योजना को मजबूत बनाने के लिए www.beyourmoneymanager.com पर और उपयोगी आर्टिकल्स पढ़ें। स्वास्थ्य बीमा सही समय पर खरीदना आपके और आपके परिवार के भविष्य को सुरक्षित रखने का सबसे अच्छा तरीका है।

(नोट: यह सामान्य जानकारी है। पॉलिसी खरीदने से पहले वर्तमान नियमों, प्रीमियम और शर्तों की जांच जरूर करें।)

Rajanish Kant शुक्रवार, 4 सितंबर 2026
₹25 लाख नकद जमा पर आयकर नोटिस (धारा 69), करदाता ने ITAT बैंगलोर में केस जीता – जानें पूरा मामला

बैंगलोर की महिला ने ₹25 लाख नकद जमा पर आयकर विभाग का नोटिस हराया। ITAT बैंगलोर का फैसला: बैंक से निकाली गई बचत का स्रोत साबित होने पर समय अंतराल से जोड़ नहीं। BeYourMoneyManager पर पढ़ें पूरी कहानी।

₹25 लाख नकद जमा पर आयकर नोटिस आया, फिर भी करदाता जीत गया – ITAT बैंगलोर का महत्वपूर्ण फैसला

क्या आपने भी बैंक में बड़ी नकद राशि जमा की है और आयकर विभाग से नोटिस आने का डर सताता है? हाल ही में बैंगलोर की एक महिला करदाता के साथ ऐसा ही हुआ। उन्होंने अपने बैंक खाते में ₹25 लाख नकद जमा किए। आयकर अधिकारी ने इसे धारा 69 के तहत अस्पष्टीकृत नकद (Unexplained Cash) मानकर नोटिस भेज दिया। लेकिन अंत में ITAT बैंगलोर ने करदाता के पक्ष में फैसला सुनाया।

यह मामला उन सभी लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो संपत्ति बेचने के बाद नकद जमा करते हैं या पुरानी बचत से जमा करते हैं।

क्या था पूरा मामला?

श्रीमती नागरथना (बैंगलोर, विजयनगर) BESCOM में काम करती हैं। 29 जून 2016 को उन्होंने कॉर्पोरेशन बैंक, नृपथुंगा रोड शाखा में ₹25 लाख नकद जमा किए।

आयकर विभाग के असेसिंग ऑफिसर (AO) को शक हुआ। उन्होंने पाया कि जमा से कुछ हफ्ते पहले ही उन्होंने एक संपत्ति बेची थी। AO का निष्कर्ष था कि संपत्ति की बिक्री में अतिरिक्त नकद (अंडर-द-टेबल) मिला होगा, जो जमा किया गया। इसलिए पूरे ₹25 लाख को धारा 69 के तहत अस्पष्टीकृत आय मानकर जोड़ दिया गया।

करदाता ने स्पष्टीकरण दिया कि यह राशि उनके और उनके पति की सालों की बचत से आई है। उन्होंने बैंक स्टेटमेंट दिखाए:

खुद के खाते से लगभग ₹13.17 लाख निकासी  

पति के खाते से लगभग ₹11.95 लाख निकासी  

ये निकासी पिछले दो सालों में हुई थीं। दोनों पति-पत्नी घर खरीदने के लिए बचत कर रहे थे।

CIT(A) ने भी AO के आदेश को सही ठहराया। इसके बाद मामला ITAT बैंगलोर पहुंचा।

ITAT बैंगलोर ने क्यों दिया राहत?

ITAT बैंगलोर (सदस्य: केशव दुबे और वसीम अहमद) ने 17 अगस्त 2026 को फैसला सुनाया। मुख्य बातें:

स्रोत साबित हो गया – करदाता ने बैंक स्टेटमेंट, लोन स्टेटमेंट और कैश-फ्लो डिटेल्स पेश किए। कुल निकासी जमा राशि से ज्यादा थी।

विभाग कोई सबूत नहीं दे पाया – आयकर विभाग यह साबित नहीं कर सका कि निकाली गई राशि कहीं और खर्च हो गई थी या जमा के दिन उपलब्ध नहीं थी।

सिर्फ समय का अंतर पर्याप्त नहीं – संपत्ति बिक्री और नकद जमा के बीच समय का अंतर केवल शक पैदा करता है। शक सबूत नहीं बन सकता। खरीदार का कोई बयान या अतिरिक्त नकद का कोई दस्तावेज नहीं था।

पूर्व निर्णयों का सहारा – कर्नाटक हाईकोर्ट के Smt. P. Padmavathi vs ITO मामले का हवाला दिया गया। उसमें भी पहले बैंक से निकाली गई राशि को बाद में जमा करना स्वीकार किया गया था।

ITAT ने साफ कहा: यदि नकद जमा का स्रोत पहचान योग्य बैंक निकासी से जुड़ा हो, तो सिर्फ समय के अंतराल के आधार पर स्पष्टीकरण खारिज नहीं किया जा सकता। विभाग को सकारात्मक सबूत देना होगा कि पैसा कहीं और इस्तेमाल हो चुका है।

नतीजा: ₹25 लाख का जोड़ हटा दिया गया और करदाता की अपील मंजूर कर ली गई।

आम करदाताओं के लिए सबक

सबूत रखें**: बैंक निकासी, कैश बुक, बचत का रिकॉर्ड हमेशा सुरक्षित रखें।

समय का अंतर अकेला आधार नहीं**: पुरानी बचत को बाद में जमा करने पर भी राहत मिल सकती है, बशर्ते स्रोत साफ हो।

धारा 69 का दुरुपयोग**: विभाग केवल शक के आधार पर जोड़ नहीं लगा सकता। सबूत का बोझ विभाग पर भी है।

दस्तावेज तैयार रखें**: संपत्ति बिक्री, बैंक स्टेटमेंट और कैश फ्लो का पूरा विवरण हमेशा तैयार रखें।

यह फैसला उन करदाताओं के लिए राहत भरा है जो ईमानदारी से बचत करते हैं और नकद लेन-देन करते हैं। हालांकि, हर मामले के तथ्य अलग होते हैं। अगर आपको भी ऐसा नोटिस मिला है तो योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट या टैक्स एडवोकेट से सलाह जरूर लें।

BeYourMoneyManager.com पर हम नियमित रूप से ऐसे महत्वपूर्ण टैक्स फैसलों, व्यक्तिगत वित्त टिप्स और आयकर संबंधी अपडेट लाते रहते हैं। अपने पैसे को समझदारी से मैनेज करें!

(नोट: यह आर्टिकल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित मूल लेख है। किसी भी कानूनी कार्रवाई से पहले प्रोफेशनल सलाह लें।)


Rajanish Kant
Janmastmi (जन्माष्टमी) से सीखें मनी मैनेजमेंट के अनमोल सबक | श्रीकृष्ण और भगवद् गीता से धन प्रबंधन के टिप्स 2026

 
जन्माष्टमी 2026 पर श्रीकृष्ण के जीवन और भगवद् गीता से जानें मनी मैनेजमेंट के बेहतरीन सबक। निष्काम कर्म, विरक्ति, संतुलन और सुदामा की कहानी से सीखें सही तरीके से पैसे कमाना, बचाना और खर्च करना।

जन्माष्टमी से सीखें मनी मैनेजमेंट के अनमोल सबक  

श्रीकृष्ण की शिक्षाओं से बदलें अपनी वित्तीय जिंदगी

जन्माष्टमी सिर्फ भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का त्योहार नहीं है। यह जीवन जीने की कला, सही निर्णय लेने और मनी मैनेजमेंट की गहरी समझ भी सिखाता है। भगवद् गीता और कृष्ण की लीलाओं में छिपे सबक आज के समय में भी पूरी तरह प्रासंगिक हैं। अगर आप पैसे की चिंता, अनावश्यक खर्च या निवेश के गलत फैसलों से परेशान हैं, तो जन्माष्टमी के इन शिक्षाओं को अपनाएं।

1. निष्काम कर्म: फल की चिंता छोड़कर कर्म पर फोकस करें  

भगवद् गीता का सबसे महत्वपूर्ण श्लोक है – “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”। मतलब, हमें सिर्फ कर्म करने का अधिकार है, फल पर नहीं।  

मनी मैनेजमेंट में इसका मतलब है:  

नियमित बचत और निवेश करते रहें  

शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड के रोज के उतार-चढ़ाव पर घबराएं नहीं  

लॉन्ग-टर्म लक्ष्यों पर ध्यान दें  

जल्दी अमीर बनने की होड़ में गलत फैसले लेने से बचें। धैर्य और निरंतरता ही असली संपत्ति बनाती है।

2. धन से विरक्ति: पैसा साधन है, साध्य नहीं  

कृष्ण हमेशा सिखाते हैं कि धन से आसक्ति न रखें। धन आ जाए तो घमंड न करें, चला जाए तो निराश न हों।  

व्यावहारिक सबक:  

लालच से बचें  

जरूरत से ज्यादा सामान न खरीदें  

“क्या मुझे वाकई इसकी जरूरत है?” यह सवाल हमेशा पूछें  

यह आदत अनावश्यक खर्च रोकती है और मानसिक शांति देती है।

3. जीवन में संतुलन बनाए रखें  

कृष्ण का जीवन संतुलन का बेहतरीन उदाहरण है। बचपन में गोकुल की सादगी और बाद में द्वारका की समृद्धि – दोनों में उन्होंने आसक्ति नहीं दिखाई।  

पैसे के मामले में संतुलन का मतलब:  

जरूरतें और चाहतों में फर्क करें  

50-30-20 नियम अपनाएं (50% जरूरतें, 30% चाहतें, 20% बचत/निवेश)  

कर्ज से यथासंभव दूर रहें  

संतुलित बजट ही लंबे समय तक वित्तीय सुरक्षा देता है।

4. सुदामा की कहानी से सीखें छोटी शुरुआत और सही भावना  

सुदामा गरीब थे, लेकिन जब कृष्ण से मिले तो उन्होंने जो थोड़ा-सा पोहा था, प्रेम से अर्पित कर दिया। कुछ मांगा नहीं। कृष्ण ने उन्हें भरपूर धन दे दिया।  

इस कहानी से मनी मैनेजमेंट के सबक:  

छोटी बचत से शुरुआत करें (SIP की तरह)  

पहले ईमानदारी और मेहनत दें, फिर फल की उम्मीद करें  

धन आने पर भी विनम्र और सादा जीवन जिएं  

रिश्ते और मूल्य धन से ऊपर रखें  

5. रणनीति, धैर्य और डाइवर्सिफिकेशन  

कृष्ण महाभारत में महान रणनीतिकार थे। वे शांत रहकर सही समय पर सही कदम उठाते थे।  

निवेश में लागू करें:  

बाजार की अस्थिरता में घबराकर बेचने या खरीदने से बचें  

अलग-अलग एसेट क्लास में निवेश करें (डाइवर्सिफिकेशन)  

इमरजेंसी फंड जरूर बनाएं  

6. दान और सेवा का महत्व  

गीता में सही समय, सही जगह और सही व्यक्ति को बिना अपेक्षा के दिया गया दान सात्त्विक माना गया है। धन का एक हिस्सा समाज या जरूरतमंदों की मदद में लगाएं। इससे पैसा “जमता” है और अंदरूनी संतुष्टि मिलती है।

जन्माष्टमी पर अपनाएं ये प्रैक्टिकल टिप्स  

अपना मासिक बजट बनाएं और उसका पालन करें  

कम से कम 6 महीने का इमरजेंसी फंड तैयार करें  

ईमानदारी से कमाएं  

नियमित रूप से SIP या बचत योजना शुरू करें  

खर्च करने से पहले दो बार सोचें  

थोड़ा दान जरूर करें  

निष्कर्ष  

जन्माष्टमी हमें याद दिलाती है कि असली अमीरी बाहरी बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि अंदर की शांति, संतुलन और सही कर्म में है। श्रीकृष्ण की शिक्षाओं को अपनाकर आप न सिर्फ पैसे को बेहतर तरीके से मैनेज कर सकते हैं, बल्कि जीवन में तनाव भी कम कर सकते हैं।  

इस जन्माष्टमी अपने वित्तीय जीवन को नई दिशा दें।  

जय श्री कृष्ण!

Rajanish Kant
सोना इस साल 20-30% बढ़ सकता है: फेड की ‘ऑल टॉक, नो एक्शन’ नीति और अमेरिकी कर्ज का दबाव|भारतीय निवेशकों के लिए मतलब BeYourMoneyManager

फेड की ‘ऑल टॉक, नो एक्शन’ नीति से सोने में 20-30% उछाल की संभावना – ऑएजी फंड्स के एरिक स्ट्रैंड

किटको न्यूज के साथ एक इंटरव्यू में ऑएजी फंड्स के संस्थापक एरिक स्ट्रैंड ने कहा है कि सोना इस साल के बाकी समय में आसानी से 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। उनका मानना है कि बाजार अभी ऊंची ब्याज दरों और मजबूत डॉलर पर फोकस कर रहा है, लेकिन असल कहानी अमेरिकी सरकार का बढ़ता कर्ज और फेड की मजबूरी है।

स्ट्रैंड के अनुसार, फेडरल रिजर्व फिलहाल महंगाई से लड़ने का दिखावा कर रहा है, लेकिन असल में वह “ऑल टॉक, नो एक्शन” है। अमेरिकी संघीय कर्ज अब 40 ट्रिलियन डॉलर से ऊपर जा चुका है। कर्ज की सर्विसिंग का खर्च इतना बढ़ गया है कि सरकार को लंबे समय के लिए कम ब्याज दरों की जरूरत है।  

“उन्हें लंबे रेट पर कम ब्याज चाहिए। मेरे लिए यह बिल्कुल साफ है कि उन्हें QE करना पड़ेगा, या जो भी नाम वे दें,” स्ट्रैंड ने कहा।

महंगाई की असल वजह क्या है?

स्ट्रैंड का कहना है कि मौजूदा महंगाई डिमांड-पुल नहीं, बल्कि कॉस्ट-पुश है। यानी कमोडिटी और इनपुट कॉस्ट बढ़ने से महंगाई आ रही है, न कि उपभोक्ता ज्यादा खरीद रहे हैं। ऐसे में ब्याज दरें बढ़ाने से महंगाई नहीं घटेगी, बल्कि और लागत बढ़ जाएगी।  

बाजार अभी ऊंची दरों की उम्मीद में पोजीशन बना रहा है, जिससे डॉलर मजबूत और सोना दबाव में है। लेकिन जब बाजार को समझ आएगा कि फेड वास्तव में सख्ती नहीं कर सकता, तो पोजीशन बदलने से सोने में तेज उछाल आ सकता है। अगस्त में सोने ने करीब 10 प्रतिशत का रैली किया था, जो आगे आने वाले मूव का छोटा सा झलक मात्र है।

निवेशकों के लिए मौका

स्ट्रैंड ने हालिया करेक्शन को “दूसरा मौका” बताया। जिन्होंने पहले रैली मिस की, वे अब एंट्री ले सकते हैं। वे सोने के साथ-साथ प्रेशियस मेटल्स माइनर्स पर भी बहुत बुलिश हैं। माइनर्स की वैल्यूएशन अभी भी कमोडिटी प्राइस के मुकाबले सस्ती है, बैलेंस शीट मजबूत हुई है और नए माइन डेवलपमेंट की कमी से सप्लाई सीमित रहेगी।

संरचनात्मक कारण

अमेरिकी डॉलर लंबे समय तक मजबूत नहीं रह सकता।  

कर्ज चुकाने के लिए ज्यादा प्रिंटिंग जरूरी होगी।  

जमीन से सोना और सिल्वर निकालने की मात्रा सीमित है।  

डिफेंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर में मेटल्स की मांग बढ़ रही है।  

भारतीय निवेशकों के लिए मतलब

भारत में सोना हमेशा से सुरक्षित निवेश और मुद्रास्फीति से बचाव का साधन रहा है। वैश्विक स्तर पर फेड की मजबूरियां और अमेरिकी कर्ज का दबाव सोने की लंबी अवधि की मांग को सपोर्ट कर सकता है। गोल्ड ईटीएफ, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड या फिजिकल गोल्ड के जरिए पोर्टफोलियो में विविधता लाना समझदारी भरा कदम हो सकता है। हालांकि, शॉर्ट-टर्म वोलेटिलिटी बनी रह सकती है।

निष्कर्ष

एरिक स्ट्रैंड का विश्लेषण साफ संकेत देता है कि सोना सिर्फ महंगाई या ब्याज दरों का खेल नहीं है। अमेरिकी कर्ज का बोझ और फेड की सीमित क्षमता लंबे समय में सोने के पक्ष में काम करेगी। जब बाजार “ऑल टॉक, नो एक्शन” को स्वीकार करेगा, तब 20-30 प्रतिशत का मूव आसानी से संभव है।

(स्रोत: किटको न्यूज इंटरव्यू, एरिक स्ट्रैंड, सितंबर 2026)


Rajanish Kant
चीन ने 2026 में 60 टन सोना जोड़ा, कुल रिजर्व 2,366 टन पहुंचा – केंद्रीय बैंकों की जुलाई में 23 टन नेट खरीद |भारतीय निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है? BeYourMoneyManager

चीन और पोलैंड की अगुवाई में जुलाई में केंद्रीय बैंकों ने 23 टन सोना खरीदा – WGC रिपोर्ट

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2026 में वैश्विक केंद्रीय बैंकों ने नेट 23 टन सोना अपने रिजर्व में जोड़ा। इसमें चीन और पोलैंड सबसे आगे रहे। चीन ने अकेले 20 टन सोना खरीदा, जबकि पोलैंड ने 8 टन का योगदान दिया।

इस खरीद से चीन के आधिकारिक सोने के भंडार 2026 में कुल 60 टन बढ़कर अब लगभग 2,366 टन हो गए हैं। यह दुनिया में छठा सबसे बड़ा रिपोर्टेड गोल्ड होल्डिंग वाला देश है और कुल विदेशी मुद्रा भंडार का करीब 8 प्रतिशत हिस्सा सोने में है। पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना (PBoC) ने लगातार 21वें महीने सोना खरीदा है। मई 2026 से डबल-डिजिट में मासिक खरीद का सिलसिला जारी है।

पोलैंड साल-दर-साल (YTD) में सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है। इसने 2026 में अब तक 90 टन सोना जोड़ा है। देश का कुल सोने का भंडार 640 टन पहुंच चुका है, जो 700 टन के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है और कुल रिजर्व का करीब 28 प्रतिशत है।

अन्य खरीदारों में चेक नेशनल बैंक (2 टन), कजाकिस्तान, मलेशिया और बोलीविया (प्रत्येक 1 टन) शामिल रहे। वहीं रूस में रूस में रूस में रूस में रूस में रूस में रूस में रूस में रूस में रूस में रूस में रूस में रूस में रूस में रूस में रूस में रूस में रूस ने 6 टन सोना बेचा, जो जुलाई में सबसे बड़ा नेट सेलर था। टर्की, जॉर्डन और उज्बेकिस्तान ने भी 1-1 टन बेचा। साल 2026 में अब तक केंद्रीय बैंकों की रिपोर्टेड नेट खरीद करीब 130 टन है, जो पिछले साल की इसी अवधि के लगभग 160 टन से कम है।

क्यों खरीद रहे हैं केंद्रीय बैंक सोना?

WGC की सीनियर रिसर्च लीड मारीसा सलीम के अनुसार, उभरते बाजारों के केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति और भू-राजनीतिक जोखिमों से बचाव के लिए अपने भंडार में विविधता ला रहे हैं। सोना सुरक्षित और क्रेडिट रिस्क-फ्री एसेट के रूप में उनकी पसंद बना हुआ है। बैंक ऑफ कोरिया ने 13 साल बाद आधिकारिक रूप से सोना आवंटन की घोषणा की है, जबकि नामीबिया भी अपने सोने के भंडार को बढ़ाने की योजना बना रहा है।

भारतीय निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है?

भारत में सोना लंबे समय से बचत और निवेश का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। वैश्विक केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीद सोने की मांग को मजबूत आधार देती है। जब बड़ी अर्थव्यवस्थाएं जैसे चीन अपने रिजर्व में सोना बढ़ा रही हैं, तो यह लंबी अवधि में कीमतों को सपोर्ट कर सकता है। मुद्रास्फीति, डॉलर की स्थिति और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सोना पोर्टफोलियो डायवर्सिफिकेशन का अच्छा विकल्प बना रहता है।

निष्कर्ष

केंद्रीय बैंकों की यह खरीद प्रवृत्ति बताती है कि सोना सिर्फ एक कमोडिटी नहीं, बल्कि रणनीतिक रिजर्व एसेट है। चीन का 60 टन का YTD एडिशन और पोलैंड का आक्रामक लक्ष्य इस ट्रेंड को मजबूती दे रहा है। निवेशकों को अपनी रिस्क प्रोफाइल के अनुसार गोल्ड ईटीएफ, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड या फिजिकल गोल्ड पर नजर रखनी चाहिए।

(स्रोत: वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल और किटको न्यूज रिपोर्ट, सितंबर 2026)


Rajanish Kant
वरिष्ठ नागरिकों की जीवन भर की बचत छीनने वाला Cyber Fraud: AU बैंक खाते खाली, क्या करें सुरक्षा के उपाय? | BeYourMoneyManager की सलाह

वरिष्ठ नागरिकों की जिंदगी की कमाई लूटने वाला साइबर फ्रॉड: Didwana का दर्दनाक मामला और सबके लिए सबक

आजकल साइबर फ्रॉड सिर्फ युवाओं तक सीमित नहीं रह गया है। वरिष्ठ नागरिक, जो अपनी मेहनत की कमाई और पेंशन पर निर्भर रहते हैं, फ्रॉडस्टर्स के निशाने पर हैं। हाल ही में राजस्थान के डिडवाना में एक बुजुर्ग दंपति के साथ हुआ साइबर फ्रॉड इसका ताजा और दर्दनाक उदाहरण है।

क्या हुआ था?

18 अगस्त को फ्रॉडस्टर्स ने बैंक अधिकारियों का रूप धारण कर बुजुर्ग चाचा-चाची से संपर्क किया। क्रेडिट कार्ड जारी करने और ₹20,000 के जुर्माने को रिवर्स करने के नाम पर उन्होंने बैंकिंग डिटेल्स हासिल कर लिए। फोन भी कथित तौर पर हैक हो गया। रात भर में उनके AU Small Finance Bank (डिडवाना ब्रांच) के खाते खाली कर दिए गए। फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और रिकरिंग डिपॉजिट (RD) तक समय से पहले तोड़ दिए गए।  

जीवन भर की पेंशन बचत और मेहनत की कमाई लगभग पूरी तरह चली गई। अब तक सिर्फ ₹52,000 ही रिकवर हो पाए हैं। बैंक की तरफ से असामान्य ट्रांजेक्शन या FD/RD तोड़ने पर कोई कन्फर्मेशन कॉल नहीं आई, जो चिंता का विषय है। FIR दर्ज हो चुकी है और परिवार मदद मांग रहा है।

यह मामला सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे देश के वरिष्ठ नागरिकों और उनके परिवार वालों के लिए चेतावनी है।

साइबर फ्रॉड से कैसे बचें? (Money Management Tips)

कभी भी OTP, PIN या CVV किसी को न बताएं  

बैंक या कोई भी अधिकारी फोन पर ये डिटेल्स नहीं मांगता। अगर कोई मांगे तो तुरंत फोन काट दें और बैंक के आधिकारिक नंबर पर कॉल करें।

असामान्य कॉल या मैसेज पर शक करें  

“जुर्माना रिवर्स”, “क्रेडिट कार्ड फ्री”, “खाता ब्लॉक” जैसे शब्द सुनते ही सतर्क हो जाएं।

FD/RD और बचत खाते की सुरक्षा  

बड़ी रकम वाली FD/RD पर ट्रांजेक्शन अलर्ट और लिमिट सेट कराएं।  

Online banking में Two-Factor Authentication हमेशा ऑन रखें।  

 नियमित रूप से स्टेटमेंट चेक करें।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए खास सावधानी  

 परिवार के युवा सदस्य नियमित रूप से उनके अकाउंट की निगरानी करें। बैंक में “Transaction Confirmation Call” या अतिरिक्त सुरक्षा फीचर के बारे में पूछें।

फ्रॉड होने पर तुरंत क्या करें?  

 तुरंत बैंक को सूचित करें और अकाउंट फ्रीज करवाएं।  

 साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करें या local police में FIR दर्ज कराएं।  

National Cyber Crime Reporting Portal (cybercrime.gov.in) पर शिकायत दर्ज करें।

BeYourMoneyManager की सलाह

पैसे कमाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उसे सुरक्षित रखना। वरिष्ठ नागरिकों की बचत उनकी जिंदगी की सुरक्षा है। ऐसे फ्रॉड से बचने के लिए जागरूकता सबसे बड़ा हथियार है।  

अगर आपके परिवार में बुजुर्ग हैं तो आज ही उनके अकाउंट की सुरक्षा चेक करें। किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तुरंत कार्रवाई करें।

याद रखें – पैसे का सही प्रबंधन ही असली धन है।  

(यह लेख जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी फ्रॉड केस में संबंधित बैंक और पुलिस से संपर्क करें।)


Rajanish Kant गुरुवार, 3 सितंबर 2026
SBI UPI ग्राहकों के लिए जरूरी अलर्ट: 4 सितंबर को UPI सेवाएं 45 मिनट के लिए बंद रहेंगी l इस दौरान क्या करें?lBHIM SBI Payl beyourmoneymanager l

अगर आप स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के ग्राहक हैं और रोजाना UPI से पेमेंट करते हैं, तो यह खबर आपके लिए बहुत जरूरी है। SBI ने घोषणा की है कि 4 सितंबर 2026 को निर्धारित मेंटेनेंस के कारण उसकी UPI सेवाएं अस्थायी रूप से बंद रहेंगी।

कब बंद रहेगी SBI UPI सेवा?

SBI UPI सेवाएं 4 सितंबर 2026 को रात 00:15 बजे से 01:00 बजे तक (कुल 45 मिनट) उपलब्ध नहीं रहेंगी। बैंक ने साफ कहा है कि मेंटेनेंस जल्दी भी खत्म हो सकता है। इस दौरान सामान्य UPI ट्रांजेक्शन प्रभावित होंगे।

इस दौरान क्या करें? UPI Lite का इस्तेमाल करें

SBI ने ग्राहकों को सलाह दी है कि इस छोटी अवधि में UPI Lite सेवा का इस्तेमाल जारी रखें। UPI Lite छोटी रकम के ट्रांजेक्शन के लिए बहुत सुविधाजनक है।

UPI Lite की मुख्य बातें:

बिना UPI PIN डाले ₹1,000 तक का ट्रांजेक्शन कर सकते हैं

अधिकतम बैलेंस लिमिट ₹5,000 है

तेज और आसान भुगतान के लिए उपयोगी

BHIM SBI Pay ऐप पर UPI Lite कैसे चालू करें?

BHIM SBI Pay ऐप डाउनलोड करें या खोलें  

UPI Lite सेक्शन पर टैप करें  

ऐप आपको UPI Lite में पैसे लोड करने के लिए प्रॉम्प्ट करेगा  

फंड लोड करने के बाद UPI Lite चालू हो जाएगा  

ध्यान रखें: UPI Lite बैलेंस पर कोई ब्याज नहीं मिलता। अगर आप मोबाइल बदल रहे हैं तो पहले पुराने डिवाइस पर UPI Lite डिसेबल करके बैलेंस अपने अकाउंट में वापस ट्रांसफर कर लें।

SBI UPI ट्रांजेक्शन लिमिट (याद रखने लायक)

Person to Person (P2P) ट्रांजेक्शन: दिन में 20  

UPI ट्रांजेक्शन वैल्यू लिमिट: ₹1 लाख प्रति ट्रांजेक्शन और प्रति दिन  

कुछ विशेष मर्चेंट्स (इंश्योरेंस, कैपिटल मार्केट, टैक्स, अस्पताल, शिक्षा आदि) पर ज्यादा लिमिट उपलब्ध  

पैसे के स्मार्ट मैनेजमेंट का सबक

बैंकिंग सिस्टम में समय-समय पर मेंटेनेंस होना सामान्य बात है। ऐसे छोटे-छोटे डाउनटाइम से बचने के लिए हमेशा एक बैकअप पेमेंट विकल्प (दूसरा बैंक अकाउंट, UPI Lite या कैश) तैयार रखें। डिजिटल पेमेंट सुविधाजनक है, लेकिन तैयार रहना और समझदारी से इस्तेमाल करना ही असली मनी मैनेजमेंट है।

SBI ग्राहकों से अनुरोध है कि 4 सितंबर की आधी रात के आसपास जरूरी पेमेंट पहले ही पूरा कर लें या UPI Lite का इस्तेमाल करें।

अधिक अपडेट और पर्सनल फाइनेंस टिप्स के लिए जुड़े रहें  

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Rajanish Kant
Cricketer रॉबिन उथप्पा की कहानी: अचानक आई दौलत ने कैसे लगभग तोड़ दियाl पैसा आने से पहले ही तय कर लें कि पैसे को लेकर आपके सिद्धांत क्या होंगे beyourmoneymanager

पूर्व भारतीय क्रिकेटर रॉबिन उथप्पा ने हाल ही में अपनी जिंदगी का एक बहुत ही ईमानदार अनुभव साझा किया। उन्होंने लिखा कि 2008 में जब उन्हें अपना पहला IPL कॉन्ट्रैक्ट मिला, तो वह सिर्फ 21-22 साल के थे। रकम थी ₹3.2 करोड़। 2008 में ₹3.2 करोड़!

उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि इतनी बड़ी रकम वे 30 साल की उम्र में भी कमा पाएंगे, 40 में भी नहीं… शायद कभी नहीं। असली बात सिर्फ पैसे की मात्रा नहीं थी। असली बात यह थी कि 22 साल पूरे होने से पहले ही उन्होंने एक ही सीजन में अपने पूरे परिवार की कई पीढ़ियों की कुल कमाई से ज्यादा कमा लिया था।

और सबसे बड़ी समस्या यह थी कि सलाह देने वाला कोई नहीं था। आसपास किसी ने कभी ऐसी स्थिति का सामना नहीं किया था।

आज जब कोई युवा उद्यमी, खिलाड़ी या फाउंडर अचानक बड़ी रकम हासिल करता है—पहली बड़ी डील, पहला बड़ा निवेश, पहला बड़ा बोनस—तो रॉबिन सबसे पहले यही समझाते हैं:

बहुत सारा पैसा अपने साथ बहुत सारे लोग और बहुत सारी समस्याएँ भी लेकर आता है।

अचानक पैसा आने पर समझ नहीं आता कि उसका क्या करें। सही मार्गदर्शन न मिले तो आप लंबे समय तक उलझन में फँसे रह सकते हैं। मध्यमवर्गीय परिवार में इतनी बड़ी रकम आ जाए तो दिमाग में लाखों विचार आते हैं। उन विचारों से उलझनें पैदा होती हैं और उलझनों से गलतफहमियाँ।

कोई आपको यह नहीं सिखाता कि एक झटके में अमीर हो जाने के बाद क्या करना है। रिश्तेदारों को कैसे समझाएँ कि आपका पैसा आपका है, उनका नहीं। फिर गलतियाँ होती हैं—जहाँ “ना” कहना चाहिए वहाँ “हाँ” कह देते हैं, गलत लोगों पर भरोसा करते हैं, समझे बिना निवेश कर देते हैं, परिवार की समस्याओं को सिर्फ चेक लिखकर हल करने की कोशिश करते हैं। सोचते हैं कि पैसे से शांति खरीदी जा सकती है। लेकिन ये चीजें अक्सर काम नहीं करतीं, बल्कि कई बार स्थिति और बिगाड़ देती हैं।

2009 तक रॉबिन अवसाद से जूझ रहे थे। दक्षिण अफ्रीका के एक होटल की 23वीं मंजिल की खिड़की की मुंडेर पर बैठे थे। उस समय जितना भी पैसा वे कमा रहे थे, उसका उनके लिए कोई मतलब नहीं रह गया था।

यही बात वे हर उस युवा को समझाना चाहते हैं जो आज बहुत पैसा कमा रहा है:

पैसा आपको उन चीजों से नहीं बचा सकता जो वास्तव में जिंदगी में मायने रखती हैं।

पैसा अवसाद से नहीं बचाता। पैसा उस परिवार को ठीक नहीं कर सकता जो पहले से समस्याओं से जूझ रहा हो। पैसा आपको समय, शांति या आत्मसम्मान नहीं खरीद सकता। और पैसा यह सुनिश्चित नहीं करता कि आपके आसपास के लोग आपके साथ बेहतर व्यवहार करेंगे। वास्तव में, पैसा कई बार लोगों के व्यवहार को ऐसे तरीके से बदल देता है जिसके लिए आप तैयार ही नहीं होते।

पैसा आपकी जिंदगी में मौजूद चीजों को बढ़ा देता है। अगर आपके अंदर आत्मविश्वास और अपनी पहचान की मजबूत समझ है, तो पैसा आपको आगे बढ़ाने में मदद करेगा। लेकिन अगर आत्मविश्वास कमजोर है, तो पैसा उस कमजोर पहचान को और खोखला कर सकता है।

इसलिए अगर आप 20 की उम्र में हैं और अचानक आपकी जिंदगी में बड़ी सफलता आई है, तो ये बातें याद रखें:

ऐसा वित्तीय सलाहकार रखें जिसके हित आपके साथ जुड़े हों।

ऐसा काउंसलर रखें जिसका आपके पैसे में कोई स्वार्थ न हो।

अपने आसपास कुछ वरिष्ठ लोगों को रखें जिन्हें आपसे कुछ हासिल न करना हो।

पैसा आने से पहले ही तय कर लें कि पैसे को लेकर आपके सिद्धांत क्या होंगे।

और सबसे महत्वपूर्ण बात…

पैसा जीत नहीं है। पैसा एक परीक्षा है।

यह कहानी सिर्फ एक क्रिकेटर की नहीं है। यह हर उस युवा की है जो अचानक बड़ी कमाई के दरवाजे पर खड़ा है। पैसे का प्रबंधन सिर्फ निवेश या बचत नहीं है—यह खुद का, रिश्तों का और मानसिक स्वास्थ्य का प्रबंधन भी है।

www.beyourmoneymanager.com पर हम ठीक यही सिखाते हैं—कि पैसा आपके नियंत्रण में रहे, आप पैसे के नियंत्रण में न आ जाएँ।

Ctsy: Gaurav Pandey LinkedIn Post (Link: https://lnkd.in/p/d2NRdnzM) 

Rajanish Kant
Net NPA 1% से नीचे, लेकिन ₹19 लाख करोड़ के Loan Write-off की असली कहानी क्या है? आखिर बैंक का पैसा कहां गया?

बैंकिंग सेक्टर में Net NPA 1% से नीचे आ गया है। सुनने में यह बड़ी उपलब्धि लगती है। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि बैंकों के खराब कर्ज की समस्या खत्म हो गई है?

Shankar Aiyyar अपने कॉलम में इसी सवाल को उठाते हैं।

₹19 लाख करोड़ के कर्ज हुए Write-off

पिछले **11 वर्षों में बैंकों ने करीब ₹19 लाख करोड़ के Loans को Write-off किया है।**

लेकिन Write-off का मतलब यह नहीं है कि कर्ज माफ कर दिया गया या बैंक ने पैसा छोड़ दिया। इसका मतलब है कि बैंक ने उस खराब कर्ज को अपनी नियमित Balance Sheet से अलग कर दिया और उसकी Recovery की प्रक्रिया जारी रह सकती है।

सबसे बड़ा सवाल है—इन Write-off किए गए Loans में से वास्तव में कितना पैसा वापस आया?**

Recovery Rate सिर्फ 35%

वित्त वर्ष **2024-25 में Write-off किए गए Loans की Recovery Rate करीब 35% रही।**

यानी आसान भाषा में कहें तो—

**हर ₹100 के Write-off Loan में केवल ₹35 की Recovery हुई।**

पिछले पांच वर्षों का आंकड़ा भी चिंता पैदा करता है। इस अवधि में बैंकों ने करीब **₹9.23 लाख करोड़ के Loans Write-off किए**, लेकिन इनमें से केवल **₹2.10 लाख करोड़ ही वापस वसूल हो सके।**

यानी बड़ी रकम अभी भी Recovery के इंतजार में है।

Net NPA 1% से कम—तो फिर समस्या कहां है?

आज बैंकों का **Net NPA 1% से नीचे** है। यह निश्चित रूप से बैंकिंग सिस्टम की मजबूती का संकेत माना जा सकता है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

Net NPA और वास्तविक Cash Recovery एक ही चीज नहीं हैं।**

किसी Loan को Balance Sheet से हटाने या उसके खिलाफ Provision बनाने से बैंक का reported NPA कम हो सकता है। लेकिन इसका यह मतलब जरूरी नहीं कि पूरा पैसा वास्तव में बैंक के पास वापस आ गया है।

यही कारण है कि **कम Net NPA को देखकर यह मान लेना कि Bad Loans की समस्या पूरी तरह खत्म हो गई है, सही तस्वीर नहीं हो सकती।**

₹1.77 लाख करोड़ के सामने 2,104 Wilful Defaulters

जून 2025 तक Public Sector Banks (PSBs) द्वारा रिपोर्ट किए गए **2,104 Wilful Defaulters पर करीब ₹1.77 लाख करोड़ की राशि बकाया थी।**

यह आंकड़ा बताता है कि बैंकिंग सिस्टम में ऐसे मामलों की समस्या अभी भी मौजूद है जहां कर्ज चुकाने की क्षमता या जिम्मेदारी के बावजूद भुगतान नहीं किया गया।

IBC का वादा और जमीनी हकीकत

Insolvency and Bankruptcy Code यानी **IBC** से उम्मीद थी कि खराब Loans की Recovery तेज होगी।

कानून के तहत Insolvency Case को **14 दिनों में Admit** करने और Resolution Process को सामान्यतः **330 दिनों के भीतर पूरा करने** का लक्ष्य रखा गया है।

लेकिन व्यवहार में तस्वीर अलग दिखाई देती है।

कई मामलों में Admission में ही महीनों लग जाते हैं और Resolution Process को 900 दिनों से ज्यादा समय लग जाता है।

मार्च 2026 तक NCLT में 1,885 Insolvency Cases लंबित थे और इनमें करीब तीन-चौथाई मामले 330 दिनों की निर्धारित समय-सीमा पार कर चुके थे।

तो क्या Bad Loans खत्म हो गए हैं?

यही इस पूरे मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है:

**क्या Bad Loans वास्तव में खत्म हो गए हैं—या वे सिर्फ Banks की Balance Sheet से निकलकर Public Ledger में चले गए हैं?**

Net NPA में कमी निश्चित रूप से सकारात्मक है। लेकिन असली सफलता तब मानी जाएगी जब Write-off किए गए Loans से वास्तविक Cash Recovery भी तेजी से बढ़े।

क्योंकि आखिरकार **Write-off और Recovery के बीच जो अंतर है, उसकी कीमत किसी न किसी रूप में जनता और अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ती है।**

इसीलिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि बैंक का Net NPA कितना है।

हमें यह भी देखना चाहिए:

कितना Loan Write-off हुआ?

कितना पैसा वास्तव में Recover हुआ?

Recovery में कितना समय लगा?

और आखिरकार इस पूरी प्रक्रिया की लागत कौन उठा रहा है?**

Net NPA का कम होना अच्छी खबर है, लेकिन असली “NPA Miracle” तभी माना जाएगा जब Bad Loans की Recovery भी मजबूत, तेज और पारदर्शी हो।

आम Bank Customer को क्या समझना चाहिए?

दोस्तों, इस पूरी चर्चा से आम बैंक ग्राहक और निवेशक के लिए तीन महत्वपूर्ण बातें निकलती हैं।

### पहली बात

**कम NPA निश्चित रूप से अच्छी खबर है।**

इसका मतलब Banking Sector की Asset Quality में सुधार हुआ है।

### दूसरी बात

**Write-off को Loan Recovery का पर्याय नहीं समझना चाहिए।**

Write-off Accounting का एक हिस्सा है।

असल सफलता तब है जब पैसा वास्तव में वापस आए।

### तीसरी बात

**Recovery की Speed बहुत महत्वपूर्ण है।**

₹100 आज Recover होना और ₹100 कई साल बाद Recover होना—दोनों की आर्थिक कीमत समान नहीं होती।

समय बढ़ने के साथ Opportunity Cost, Legal Cost और अन्य खर्च भी बढ़ सकते हैं।

# अंतिम सवाल

तो दोस्तों,

आज भारत के Banking Sector के सामने एक तरफ एक अच्छी खबर है—

**Net NPA 1% से नीचे।**

लेकिन दूसरी तरफ एक बड़ा सवाल भी है—

**पिछले 11 वर्षों में ₹19 लाख करोड़ के Loans Write-off होने के बाद वास्तविक Recovery कितनी हुई?**

अगर 2024-25 में Recovery Rate करीब 35% रही, तो हमें यह सवाल पूछना ही चाहिए कि बाकी रकम की Recovery कैसे और कब होगी?

और यही हमें उस महत्वपूर्ण सवाल तक ले जाता है—

**क्या Bad Loans वास्तव में खत्म हो गए हैं, या उनका कुछ हिस्सा सिर्फ Bank Balance Sheet से बाहर चला गया है?**

मेरी नजर में इस पूरे मुद्दे को समझने का सही तरीका है—

**NPA कम होना अच्छी खबर है।

लेकिन Recovery बढ़ना उससे भी बड़ी खबर है।**

क्योंकि अंततः बैंक की मजबूती सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि कितने खराब Loans दिखाई दे रहे हैं।

बल्कि इस बात से भी तय होती है कि—

**कितना पैसा वापस आया, कितनी जल्दी आया और किस कीमत पर आया।**

# **Net NPA 1% से नीचे… लेकिन ₹19 लाख करोड़ का सवाल! आखिर बैंक का पैसा कहां गया?**

खुशी की बात यह है कि आज बैंकों का **Net NPA 1% से नीचे** आ गया है।

लेकिन सवाल यह है—

**अगर बैंकों की स्थिति इतनी अच्छी है, तो पिछले 11 वर्षों में करीब ₹19 लाख करोड़ के Loans Write-off क्यों किए गए?

और उससे भी बड़ा सवाल—

**इन Write-off किए गए Loans में से वास्तव में कितना पैसा वापस आया?**

यही सवाल Shankar Aiyar ने अपने हालिया कॉलम में उठाया है।

आइए इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं।

## पहला सवाल—₹19 लाख करोड़ का Write-off आखिर है क्या?

सबसे पहले एक बहुत महत्वपूर्ण बात।

जब हम सुनते हैं कि बैंक ने किसी Loan को Write-off कर दिया, तो आम आदमी अक्सर समझता है कि बैंक ने उस कर्ज को माफ कर दिया।

लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है।

**Write-off का मतलब यह नहीं कि Recovery की कोशिश खत्म हो गई।**

इसका मतलब मुख्य रूप से यह है कि बैंक ने उस खराब Loan को अपनी नियमित Accounting में अलग तरीके से दर्ज किया है और उसके खिलाफ जरूरी Provision या Accounting Adjustment किया है।

लेकिन Recovery की प्रक्रिया आगे भी चल सकती है।

अब असली सवाल है—

Recovery कितनी हुई?

# ₹100 के Loan में सिर्फ ₹35 वापस!

दिए गए आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष **2024-25 में Write-off किए गए Loans की Recovery Rate करीब 35% रही।

यानी आसान भाषा में समझिए—

अगर बैंक ने **₹100 का Loan Write-off किया**, तो उसमें से औसतन सिर्फ **₹35 की Recovery** हुई।

बाकी **₹65 की Recovery नहीं हो सकी।**

यह आंकड़ा हमें बताता है कि केवल Write-off की राशि देखकर पूरी तस्वीर समझ में नहीं आती।

हमें Recovery भी देखनी होगी।

# पिछले 5 वर्षों का आंकड़ा और भी महत्वपूर्ण

अब जरा पिछले पांच वर्षों की तस्वीर देखिए।

करीब **₹9.23 लाख करोड़ के Loans Write-off किए गए।**

लेकिन इनमें से सिर्फ **₹2.10 लाख करोड़** की Recovery हो सकी।

यानी Write-off की गई बड़ी रकम की तुलना में वास्तविक Recovery काफी कम रही।

इसलिए सवाल उठना स्वाभाविक है—

**क्या Loan को Balance Sheet से हटाना और पैसा वापस पाना—दो अलग-अलग बातें हैं?**

जी हां।

और यही इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

# Net NPA 1% से नीचे—तो फिर चिंता क्यों?

अब आते हैं उस आंकड़े पर जिस पर Banking Sector को गर्व होना चाहिए।

**Net NPA 1% से नीचे है।**

इसका मतलब है कि बैंकों की Asset Quality में काफी सुधार हुआ है।

यह अच्छी खबर है।

लेकिन यहां हमें दो चीजों को अलग-अलग समझना होगा—

**Net NPA और Cash Recovery।**

दोनों एक ही चीज नहीं हैं।

मान लीजिए किसी बैंक के खराब Loan को Accounting और Provisioning के जरिए Balance Sheet पर अलग तरीके से दिखाया गया।

इससे बैंक का reported NPA कम दिखाई दे सकता है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बैंक को पूरा पैसा Cash में वापस मिल चुका है।

इसलिए—

**कम Net NPA = अच्छी खबर**

लेकिन

**कम Net NPA = हर खराब Loan की पूरी Recovery हो गई**

यह मान लेना सही नहीं होगा।

 2,104 Wilful Defaulters पर ₹1.77 लाख करोड़

अब एक और बड़ा आंकड़ा देखिए।

जून 2025 तक Public Sector Banks यानी PSBs ने **2,104 Wilful Defaulters** के बारे में रिपोर्ट किया था।

इन पर करीब **₹1.77 लाख करोड़** की राशि बकाया बताई गई।

Wilful Default का मामला सामान्य Loan Default से अलग होता है।

इसमें यह सवाल उठता है कि क्या Borrower के पास भुगतान करने की क्षमता या संसाधन होते हुए भी उसने जानबूझकर Loan की repayment नहीं की।

इसलिए ऐसे मामलों में Recovery और Accountability दोनों बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

IBC आया था तेज Recovery के लिए

अब बात करते हैं **Insolvency and Bankruptcy Code यानी IBC** की।

IBC आने के पीछे एक बड़ा उद्देश्य था—

**Bad Loans की Recovery को तेज करना।**

कानून में Insolvency Application को Admission के लिए लगभग **14 दिनों** की समय-सीमा का प्रावधान है और Resolution Process के लिए सामान्यतः **330 दिनों** का लक्ष्य रखा गया है।

सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है।

लेकिन जमीन पर क्या होता है?

कई मामलों में Admission में ही महीनों लग जाते हैं।

और Resolution Process कई मामलों में **900 दिनों से ज्यादा** खिंच जाता है।

यानी जो प्रक्रिया लगभग एक साल के अंदर पूरी होनी चाहिए थी, वह कई मामलों में ढाई साल से भी ज्यादा समय ले रही है।

NCLT में 1,885 मामले लंबित

मार्च 2026 तक **NCLT में 1,885 Insolvency Cases लंबित** बताए गए।

और इनमें लगभग तीन-चौथाई मामले निर्धारित **330 दिनों की सीमा पार कर चुके थे।**

अब आप सोचिए—

अगर Recovery Process ही लंबी होती चली जाए, तो बैंक को पैसा कब मिलेगा?

और जब पैसा देर से मिलेगा, तो उसकी आर्थिक कीमत कौन चुकाएगा?

यही सवाल बहुत महत्वपूर्ण है।

# क्या Bad Loans वास्तव में गायब हो गए?

अब आते हैं इस पूरी कहानी के सबसे बड़े सवाल पर।

**क्या भारत में Bad Loans की समस्या खत्म हो गई है?**

या फिर—

**क्या Bad Loans का एक हिस्सा Bank Balance Sheet से हटकर किसी दूसरे रूप में दिखाई दे रहा है?**

Net NPA में गिरावट निश्चित रूप से अच्छी खबर है।

इसका मतलब है कि Banking Sector की स्थिति पहले के मुकाबले मजबूत हुई है।

लेकिन Banking Sector की वास्तविक मजबूती को केवल एक आंकड़े से नहीं मापा जा सकता।

हमें चार चीजें साथ-साथ देखनी होंगी—

**कितना Loan दिया गया?**

**कितना Loan खराब हुआ?**

**कितना Write-off हुआ?**

और सबसे महत्वपूर्ण—

**कितना पैसा वास्तव में वापस आया?**

# आखिर कीमत कौन चुकाता है?

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल—**Citizen Janardhan यानी आम नागरिक की इसमें क्या भूमिका है?**

जब बैंक को किसी Loan की पूरी Recovery नहीं होती, तो उसका आर्थिक असर केवल बैंक तक सीमित नहीं रहता।

Banking System अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बैंकों की Balance Sheet, Capital Requirement, Provisioning और अंततः Banking System की मजबूती का संबंध व्यापक अर्थव्यवस्था से है।

इसलिए Write-off और Recovery के बीच जितना बड़ा अंतर होगा, उतना ही बड़ा सवाल उठेगा—

**इस अंतर की कीमत आखिर कौन उठा रहा है?**

यही कारण है कि हमें केवल यह सुनकर संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए कि—

**“Net NPA 1% से नीचे आ गया।”**

हमें आगे पूछना चाहिए—

**“Recovery कितनी हुई?”**

आम Bank Customer को क्या समझना चाहिए?

दोस्तों, इस पूरी चर्चा से आम बैंक ग्राहक और निवेशक के लिए तीन महत्वपूर्ण बातें निकलती हैं।

 पहली बात

**कम NPA निश्चित रूप से अच्छी खबर है।**

इसका मतलब Banking Sector की Asset Quality में सुधार हुआ है।

दूसरी बात

Write-off को Loan Recovery का पर्याय नहीं समझना चाहिए।

Write-off Accounting का एक हिस्सा है।

असल सफलता तब है जब पैसा वास्तव में वापस आए।

 तीसरी बात

Recovery की Speed बहुत महत्वपूर्ण है।**

₹100 आज Recover होना और ₹100 कई साल बाद Recover होना—दोनों की आर्थिक कीमत समान नहीं होती।

समय बढ़ने के साथ Opportunity Cost, Legal Cost और अन्य खर्च भी बढ़ सकते हैं।

अंतिम सवाल

तो दोस्तों,

आज भारत के Banking Sector के सामने एक तरफ एक अच्छी खबर है—

**Net NPA 1% से नीचे।**

लेकिन दूसरी तरफ एक बड़ा सवाल भी है—

**पिछले 11 वर्षों में ₹19 लाख करोड़ के Loans Write-off होने के बाद वास्तविक Recovery कितनी हुई?**

अगर 2024-25 में Recovery Rate करीब 35% रही, तो हमें यह सवाल पूछना ही चाहिए कि बाकी रकम की Recovery कैसे और कब होगी?

और यही हमें उस महत्वपूर्ण सवाल तक ले जाता है—

**क्या Bad Loans वास्तव में खत्म हो गए हैं, या उनका कुछ हिस्सा सिर्फ Bank Balance Sheet से बाहर चला गया है?**

मेरी नजर में इस पूरे मुद्दे को समझने का सही तरीका है—

**NPA कम होना अच्छी खबर है।

लेकिन Recovery बढ़ना उससे भी बड़ी खबर है।**

क्योंकि अंततः बैंक की मजबूती सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि कितने खराब Loans दिखाई दे रहे हैं।

बल्कि इस बात से भी तय होती है कि—

**कितना पैसा वापस आया, कितनी जल्दी आया और किस कीमत पर आया।**

अगर आपको यह जानकारी उपयोगी लगी हो तो वीडियो को Like करें, Share करें और **BeYourMoneyManager** चैनल को Subscribe जरूर करें। 

याद रखिए—

**आपका पैसा, आपकी मेहनत की कमाई है।

इसे समझदारी से संभालिए।**




Rajanish Kant बुधवार, 2 सितंबर 2026
NPS के नए नियम 2026: PFRDA ने स्कीम्स को 5 कैटेगरी में बांटा, अब स्कीम चुनना हुआ आसान| beyourmoneymanager
NPS के संशोधित नियम: PFRDA ने स्कीम्स को पांच श्रेणियों में बांटा, सब्सक्राइबर्स के लिए स्कीम सेलेक्शन आसान बना

राष्ट्रीय पेंशन सिस्टम (NPS) के सब्सक्राइबर्स के लिए अच्छी खबर है। पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (PFRDA) ने 28 अगस्त 2026 के सर्कुलर के जरिए NPS स्कीम्स के वर्गीकरण और प्रेजेंटेशन को नया रूप दिया है। अब स्कीम्स को पांच मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है, जिससे निवेशकों के लिए सही स्कीम चुनना पहले से कहीं ज्यादा आसान और पारदर्शी हो जाएगा।

ये बदलाव मुख्य रूप से स्कीम के नामकरण, जोखिम स्तर और इक्विटी एक्सपोजर को स्टैंडर्ड बनाने पर आधारित हैं। इससे सब्सक्राइबर्स आसानी से रिटर्न, चार्जेस, रिस्क और एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) की तुलना कर सकेंगे।

NPS स्कीम्स की पांच मुख्य श्रेणियां क्या हैं?

PFRDA के नए फ्रेमवर्क के अनुसार NPS स्कीम्स अब इन पांच ब्रॉड कैटेगरी में आएंगी:

लाइफसाइकल-बेस्ड स्कीम्स  

एक्टिव चॉइस  

NPS संचय  

मल्टीपल स्कीम फ्रेमवर्क (MSF)  

4A स्कीम्स (क्यूरेटेड/थीमेटिक स्कीम्स जैसे NPS वात्सल्य, NPS स्वास्थ्य आदि)

लाइफसाइकल स्कीम्स का नया वर्गीकरण

लाइफसाइकल स्कीम्स को इक्विटी एक्सपोजर के आधार पर आगे बांटा गया है। इनमें आवंटन उम्र के साथ अपने-आप बदलता रहता है:

लाइफ साइकिल एग्रेसिव  

लाइफ साइकिल 75 – हाई  

लाइफ साइकिल 50 – मॉडरेट  

लाइफ साइकिल 25 – लो  

ये स्कीम्स उम्र के हिसाब से इक्विटी, कॉरपोरेट बॉन्ड और सरकारी सिक्योरिटीज में आवंटन एडजस्ट करती हैं।

MSF स्कीम्स की पांच रिस्क कैटेगरी

सबसे बड़ा बदलाव MSF स्कीम्स में है। इन्हें इक्विटी एक्सपोजर के आधार पर पांच स्पष्ट श्रेणियों में रखा गया है:

| कैटेगरी | कोड | रिस्क लेवल          | इक्विटी एक्सपोजर   |

|---------|-----|---------------------|--------------------|

| एग्रेसिव ग्रोथ | A   | बहुत हाई रिस्क     | 80%–100%          |

| हाई ग्रोथ    | B   | हाई रिस्क          | 60%–80%           |

| बैलेंस्ड ग्रोथ | C   | मीडियम रिस्क       | 35%–60%           |

| कंजरवेटिव   | D   | लो रिस्क           | 10%–35%           |

| डेट         | E   | बहुत लो रिस्क      | 0%–10%            |

अब हर स्कीम का नाम स्टैंडर्ड फॉर्मेट में होगा – पेंशन फंड का नाम + “NPS” + कैटेगरी कोड + स्कीम नाम। इससे रिस्क लेवल तुरंत समझ में आ जाएगा।

एक्टिव चॉइस और NPS संचय में बदलाव

एक्टिव चॉइस** में इक्विटी का अधिकतम आवंटन 75% तक (टियर-II में 100% तक) हो सकता है।  

NPS संचय** में इक्विटी 5% से 65% तक सीमित रहेगी।

सब्सक्राइबर्स के लिए क्या फायदा?

नए नियमों से स्कीम सेलेक्शन का प्रोसेस स्टैंडर्ड हो गया है। CRA प्लेटफॉर्म और अन्य चैनल्स पर अब इस क्रम में विकल्प दिखेंगे:

स्कीम का प्रकार  

कैटेगरी / एसेट एलोकेशन  

पेंशन फंड का चयन  

हर स्कीम पर ये जानकारी साफ-साफ दिखेगी –  

स्कीम नाम  

पेंशन फंड  

लॉन्च डेट  

हिस्टोरिकल रिटर्न  

बेंचमार्क  

चार्जेस  

रिस्कोमीटर  

AUM  

इससे तुलना करना आसान हो जाएगा। सब्सक्राइबर एक PRAN के तहत कई MSF स्कीम्स रख सकते हैं, लेकिन लाइफसाइकल या एक्टिव चॉइस में से एक ही चुन सकते हैं। स्कीम या पेंशन फंड बदलने के नियम भी स्पष्ट किए गए हैं।


आपको क्या करना चाहिए?


अगर आप पहले से NPS में निवेश कर रहे हैं तो घबराने की जरूरत नहीं। मौजूदा निवेश तुरंत स्विच नहीं करना पड़ेगा। पेंशन फंड्स को 30-45 दिनों में नाम बदलने और कैटेगरी अलाइन करने का समय दिया गया है। नए निवेश करने से पहले नई कैटेगरी, रिस्क लेवल और रिटर्न की तुलना जरूर करें।

निष्कर्ष:  

PFRDA का ये कदम NPS को और अधिक यूजर-फ्रेंडली और पारदर्शी बनाता है। अब रिटायरमेंट प्लानिंग करते समय रिस्क और रिटर्न को बेहतर तरीके से समझकर सही स्कीम चुनना आसान हो गया है। अपनी उम्र, रिस्क लेने की क्षमता और फाइनेंशियल गोल्स के हिसाब से स्कीम चुनें।

अधिक जानकारी और व्यक्तिगत सलाह के लिए www.beyourmoneymanager.com पर विजिट करें या अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से बात करें।

(नोट: यह आर्टिकल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। निवेश से पहले आधिकारिक PFRDA सर्कुलर और नवीनतम अपडेट जरूर चेक करें।)

Rajanish Kant