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सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने छोटे कर्जदारों से 74% वसूली की, बड़े डिफॉल्टर्स से सिर्फ 14.5% – RTI का चौंकाने वाला खुलासा | BeYourMoneyManager

 
क्या आप जानते हैं कि सार्वजनिक बैंक छोटे कर्जदारों से ज्यादा पैसा वसूलते हैं, जबकि बड़े डिफॉल्टर्स के हजारों करोड़ रुपये आसानी से राइट-ऑफ कर दिए जाते हैं? सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के 10 साल के RTI डेटा ने यही सच्चाई सामने ला दी है।

पूना के RTI एक्टिविस्ट विवेक वेलंकर (सजग नागरिक मंच) द्वारा मांगी गई जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2016-17 से 2025-26 तक सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने:

छोटे कर्जदार (₹1 करोड़ से कम)  

वसूली: ₹5,004 करोड़  

राइट-ऑफ: ₹6,774 करोड़  

रिकवरी रेट: लगभग 74%

बड़े कर्जदार (प्रत्येक ₹100 करोड़ से अधिक)  

वसूली: ₹3,874 करोड़  

राइट-ऑफ: ₹26,702 करोड़  

रिकवरी रेट: महज 14.5%

बैंक ने छोटे डिफॉल्टर्स से बड़े डिफॉल्टर्स की तुलना में ज्यादा राशि वसूल ली, फिर भी अमीर और बड़े कर्जदारों के लिए लगभग चार गुना ज्यादा राशि माफ कर दी। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बैंक ने इन बड़े डिफॉल्टर्स में से एक का भी नाम बताने से इनकार कर दिया।

यह दोहरा मापदंड क्यों मायने रखता है?

सार्वजनिक बैंक का पैसा आम नागरिकों का पैसा है – जमाकर्ताओं का, टैक्सपेयर्स का। जब छोटे कर्जदार (होम लोन, पर्सनल लोन, MSME) डिफॉल्ट करते हैं तो रिकवरी एजेंट, नोटिस, प्रॉपर्टी अटैचमेंट जैसी कार्रवाई तेजी से होती है। लेकिन बड़े कर्जदारों के मामले में नाम छुपाना, कम रिकवरी और बड़े राइट-ऑफ आम हो गए हैं।

यह सिर्फ एक बैंक की कहानी नहीं है। कई सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में ऐसी प्रवृत्ति देखी गई है। इससे बैंकों की बैलेंस शीट पर दबाव पड़ता है, ब्याज दरें प्रभावित हो सकती हैं और अंततः आम आदमी को महंगे लोन का सामना करना पड़ता है।

आम आदमी के लिए सबक (BeYourMoneyManager की सलाह)

लोन लेते समय सावधानी बरतें – अपनी आय के 40-50% से ज्यादा EMI न रखें। जरूरत से ज्यादा लोन लेने से बचें।  

CIBIL और क्रेडिट स्कोर मजबूत रखें – समय पर EMI भरने से न सिर्फ अच्छा स्कोर बनता है, बल्कि भविष्य में बेहतर ब्याज दर भी मिलती है।  

डॉक्यूमेंट्स और ट्रांसपेरेंसी का ध्यान रखें – लोन एग्रीमेंट, रिकवरी प्रक्रिया और अपने अधिकारों को समझें। आरबीआई के दिशानिर्देशों के तहत रिकवरी एजेंट्स के कुछ नियम होते हैं।  

विविधीकरण और इमरजेंसी फंड – सिर्फ लोन पर निर्भर न रहें। बचत, म्यूचुअल फंड और इमरजेंसी कॉर्पस बनाएं ताकि मुश्किल समय में डिफॉल्ट की स्थिति न बने।  

बड़े डिफॉल्टर्स पर नजर – सार्वजनिक धन की जवाबदेही मांगना हमारा अधिकार है। RTI और जागरूकता से पारदर्शिता बढ़ सकती है।

छोटा कर्जदार पीछा किया जाता है, बड़ा कर्जदार राइट-ऑफ हो जाता है – यही सच्चाई इस RTI ने दोहराई है। पैसे का सही प्रबंधन ही आपको सुरक्षित रखता है।

अपने पैसे को समझदारी से मैनेज करने के और टिप्स, लोन गाइड्स और निवेश सलाह के लिए www.beyourmoneymanager.com पर विजिट करें। अपने फाइनेंशियल फ्यूचर को मजबूत बनाएं!

(नोट: यह आर्टिकल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध RTI डेटा और रिपोर्ट्स पर आधारित मूल लेख है। डेटा स्रोत: सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया का RTI जवाब, MoneyLife और अन्य रिपोर्ट्स।)

Rajanish Kant शुक्रवार, 28 अगस्त 2026
सुभाष चंद्रा केस: ₹22,000 करोड़ के दावों पर सिर्फ ₹6.5 करोड़ चुकाना – पर्सनल गारंटी और डेट मैनेजमेंट की बड़ी सीख

सुभाष चंद्रा केस: ₹22,000 करोड़ के दावों पर सिर्फ ₹6.5 करोड़ – आम आदमी के लिए क्या सबक?

हाल ही में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने जी मीडिया ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा के पर्सनल इन्सॉल्वेंसी केस में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। इसके तहत चंद्रा को लगभग ₹22,006 करोड़ के एडमिटेड क्लेम्स के मुकाबले सिर्फ करीब ₹6.5 करोड़ चुकाने का प्लान मंजूर किया गया।

यह आंकड़ा सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में रहा। कई पोस्ट्स में इसे “₹15,500 करोड़ की माफी” या “सरकार द्वारा कर्ज माफ” के रूप में पेश किया गया। लेकिन हकीकत थोड़ी अलग है।

असल में क्या हुआ?

सुभाष चंद्रा ने खुद व्यक्तिगत रूप से इतना पैसा उधार नहीं लिया था। ये दावे मुख्य रूप से एस्सेल/जीईई से जुड़ी कंपनियों के कर्जों पर उनके द्वारा दी गई पर्सनल गारंटी के हैं। यानी कंपनियों ने लोन लिया, और चंद्रा ने गारंटर के तौर पर अपनी जिम्मेदारी ली।

NCLT ने उनके व्यक्तिगत एस्टेट से करीब ₹6.25 करोड़ क्रेडिटर्स को और कुछ प्रोसेस कॉस्ट के रूप में कुल ₹6.5 करोड़ का प्लान मंजूर किया। कई क्रेडिटर्स (जिनमें LIC हाउसिंग फाइनेंस आदि शामिल) ने इसका विरोध किया था, लेकिन 80% से ज्यादा वोटिंग शेयर वाले क्रेडिटर्स के समर्थन के बाद प्लान पास हो गया।

महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रिंसिपल बॉरोअर कंपनियां अभी भी अपने कर्ज के लिए जिम्मेदार हैं। ये ₹22,000 करोड़ का पूरा बैंक लोन राइट-ऑफ नहीं है। कई रिपोर्ट्स और स्पष्टीकरणों में कहा गया है कि कंपनियों ने पहले ही बड़ी रकम चुकाई है और बाकी के लिए बातचीत चल रही है।

आम आदमी के लिए सबसे बड़ी सीख

यह केस पर्सनल फाइनेंस और मनी मैनेजमेंट के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है:

पर्सनल गारंटी बहुत खतरनाक हो सकती है  

 बिजनेस के लिए या किसी और के कर्ज पर गारंटी देना आसान लगता है, लेकिन डिफॉल्ट होने पर आपकी व्यक्तिगत संपत्ति भी खतरे में पड़ सकती है।

बड़े और छोटे कर्जदारों का फर्क  

 किसानों या आम लोगों को छोटे कर्ज पर भी सख्ती झेलनी पड़ती है, जबकि बड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया (IBC के तहत) अलग तरीके से चलती है। यह असमानता कई लोगों को परेशान करती है।

डेट मैनेजमेंट और रिस्क असेसमेंट  

 कोई भी गारंटी या लोन लेने से पहले अपनी रेपमेंट कैपेसिटी, एसेट वैल्यूएशन और सबसे खराब स्थिति (worst-case scenario) को जरूर समझें।

कानूनी प्रक्रिया की समझ  

 इन्सॉल्वेंसी कोड के तहत क्रेडिटर्स की कमर्शियल विजडम को प्राथमिकता दी जाती है। इसलिए सिर्फ “कर्ज माफ हो गया” समझना अधूरा है।

आपके पैसे का सही प्रबंधन कैसे करें?

कभी भी बिना पूरी समझ के पर्सनल गारंटी न दें।  

अपना इमरजेंसी फंड और एसेट प्रोटेक्शन प्लान मजबूत रखें।  

लोन लेते समय EMI और कुल ब्याज का सही कैलकुलेशन करें।  

बिजनेस और पर्सनल फाइनेंस को जितना हो सके अलग रखें।

सुभाष चंद्रा केस हमें याद दिलाता है कि कर्ज और गारंटी सिर्फ बड़े कारोबारियों का मुद्दा नहीं है। सही जानकारी और अनुशासन के बिना कोई भी व्यक्ति वित्तीय मुश्किल में फंस सकता है।

अपने पैसे का सही प्रबंधन सीखने और कर्ज से जुड़ी गलतियों से बचने के लिए www.beyourmoneymanager.com पर नियमित रूप से अपडेट्स पढ़ते रहें।

नोट: यह लेख उपलब्ध समाचार रिपोर्ट्स और स्पष्टीकरणों पर आधारित है। आंकड़े और कानूनी प्रक्रिया समय के साथ बदल सकते हैं।

Rajanish Kant
Happy Raksha Bandhan! रक्षाबंधन हमें Money Management के बारे में क्या सिखाता है? beyourmoneymanager

राखी सिर्फ भाई-बहन के रिश्ते का धागा नहीं है, यह जिम्मेदारी, सुरक्षा और भविष्य की चिंता का भी प्रतीक है। अगर हम रक्षाबंधन को थोड़े अलग नजरिए से देखें, तो इस त्योहार में Money Management और Financial Planning के कई महत्वपूर्ण सबक छिपे हुए हैं।

आज रक्षाबंधन पर भाई अपनी बहन को पैसे, कपड़े, गहने या कोई अन्य उपहार देता है। लेकिन क्या हो अगर इस बार राखी का उपहार सिर्फ आज की खुशी न देकर कल की आर्थिक सुरक्षा भी सुनिश्चित करे?

यही सोच हमें रक्षाबंधन से मिलने वाले कुछ महत्वपूर्ण Money Management Lessons तक ले जाती है।

1. असली सुरक्षा सिर्फ पैसे देने से नहीं, Financial Security देने से होती है

रक्षाबंधन का अर्थ ही है—रक्षा का बंधन। पर आज के समय में किसी अपने की रक्षा का अर्थ केवल मुश्किल समय में साथ खड़ा होना नहीं है।

आर्थिक रूप से सुरक्षित बनाना भी एक तरह की रक्षा है।

अगर भाई अपनी बहन को हर साल केवल ₹5,000 या ₹10,000 का गिफ्ट देता है, तो वह पैसा कुछ समय बाद खर्च हो सकता है। लेकिन अगर वही पैसा बचत या निवेश की शुरुआत करने में लगाया जाए, तो वह भविष्य में बड़ा Financial Corpus बनाने में मदद कर सकता है।

इसलिए इस रक्षाबंधन एक सवाल जरूर पूछें:

"मैं अपने भाई या बहन को ऐसा क्या दे सकता हूं, जो आने वाले वर्षों में भी उसके काम आए?"

2. छोटी बचत को कभी छोटा मत समझिए

राखी का धागा देखने में छोटा होता है, लेकिन उसका भाव बहुत बड़ा होता है।

Money Management में भी यही बात लागू होती है।

हर महीने ₹500, ₹1,000 या ₹2,000 की बचत शुरुआत में बहुत छोटी लग सकती है। लेकिन नियमित रूप से की गई बचत और लंबे समय तक किया गया निवेश भविष्य में बड़ा फंड बना सकता है।

यही Consistency की Power है।

मान लीजिए कोई व्यक्ति हर महीने ₹2,000 निवेश करना शुरू करता है। शुरुआत में यह राशि छोटी लग सकती है, लेकिन वर्षों तक नियमित निवेश और compounding के कारण इसका प्रभाव काफी बड़ा हो सकता है।

इसलिए Financial Planning का पहला नियम हो सकता है:

राशि छोटी हो सकती है, लेकिन शुरुआत छोटी नहीं होनी चाहिए।

3. Gift और Investment में फर्क समझिए

रक्षाबंधन पर महंगा gift खरीदना आसान है।

लेकिन एक ऐसा gift देना जो भविष्य में Financial Independence की दिशा में कदम बने—यह ज्यादा समझदारी भरा फैसला हो सकता है।

उदाहरण के लिए, किसी की उम्र और Financial Goals के अनुसार:

Investment की शुरुआत

SIP की शुरुआत

Emergency Fund के लिए योगदान

Financial Education की कोई अच्छी किताब

Health या Life Insurance की जरूरत को समझना

किसी बड़े Financial Goal के लिए बचत

इनमें से कोई भी उपहार लंबे समय में ज्यादा मूल्यवान साबित हो सकता है।

हाल के वर्षों में रक्षाबंधन को Financial Independence और Investment से जोड़कर देखने की चर्चा भी बढ़ी है। 

4. भाई-बहन के बीच Money Conversation जरूरी है

भारत में परिवारों में पैसे की बात अक्सर खुले तौर पर नहीं की जाती।

कितनी Income है?

कितनी Saving है?

कितना Loan है?

कहां Investment किया है?

Emergency में कितने पैसे उपलब्ध हैं?

इन सवालों पर बातचीत करने में कई लोगों को असहजता होती है।

लेकिन भाई-बहन एक-दूसरे के सबसे भरोसेमंद लोगों में से हो सकते हैं। इसलिए रक्षाबंधन का अवसर एक अच्छी Money Conversation की शुरुआत हो सकता है।

इस बार राखी पर सिर्फ यह मत पूछिए—

"गिफ्ट में क्या चाहिए?"

यह भी पूछिए—

"तुम्हारा अगला Financial Goal क्या है?"

शायद यही बातचीत किसी के Financial Future को बदल दे।

5. Financial Independence भी एक तरह की रक्षा है

परंपरागत रूप से रक्षाबंधन में भाई अपनी बहन की रक्षा करने का वचन देता है। आज के समय में इस भावना को एक नए तरीके से समझने की जरूरत है।

किसी को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना भी उसकी रक्षा करना है।

अगर किसी महिला के पास:

अपनी Savings है,

अपना Emergency Fund है,

पर्याप्त Insurance है,

अपने नाम पर Investments हैं,

और अपने Financial Decisions लेने की समझ है,

तो वह Financially ज्यादा मजबूत होती है।

इसलिए बहन को सिर्फ "मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं" कहना ही पर्याप्त नहीं है।

कभी-कभी बेहतर संदेश यह हो सकता है:

"मैं चाहता हूं कि तुम इतनी Financially Strong बनो कि तुम्हें किसी पर आर्थिक रूप से निर्भर न रहना पड़े।"

6. आज का खर्च और कल का लक्ष्य—दोनों में Balance जरूरी है

त्योहार खुशी मनाने के लिए होते हैं और उन पर खर्च करना गलत नहीं है।

समस्या तब शुरू होती है जब त्योहार मनाने के लिए हम अपनी क्षमता से ज्यादा खर्च करने लगते हैं।

महंगे gifts, unnecessary shopping, credit card spending और बाद में EMI का बोझ—यह Money Management नहीं है।

एक स्वस्थ Financial Habit यह है कि:

पहले Budget तय करें, फिर खर्च करें।

रक्षाबंधन पर भी एक छोटा Festival Budget बनाया जा सकता है।

उदाहरण:

कुल बजट: ₹10,000

₹3,000 — Gift

₹2,000 — परिवार/त्योहार का खर्च

₹2,000 — Savings

₹3,000 — Investment या Financial Goal

यह केवल उदाहरण है। वास्तविक allocation व्यक्ति की Income, जरूरतों और Financial Goals के अनुसार होना चाहिए।

7. Emergency Fund: मुश्किल समय के लिए आर्थिक राखी

राखी हमें मुश्किल समय में साथ खड़े रहने की याद दिलाती है।

Money Management में इसका सबसे अच्छा उदाहरण है Emergency Fund।

अचानक नौकरी चली जाए, Medical Emergency आ जाए, Business में समस्या हो जाए या कोई बड़ा अनपेक्षित खर्च सामने आ जाए—ऐसे समय में Emergency Fund आर्थिक सहारा देता है।

इसलिए अपने परिवार के लिए एक Financial Safety Net बनाना भी किसी राखी से कम नहीं है।

आज की छोटी Financial Preparation, कल की बड़ी परेशानी को संभाल सकती है।

8. बच्चों को Rakhi के साथ Money Management भी सिखाएं

रक्षाबंधन बच्चों को Money Management सिखाने का शानदार अवसर हो सकता है।

अगर बच्चा राखी पर ₹1,000 पाता है, तो पूरा पैसा खर्च करने के बजाय उसे तीन हिस्सों में बांटना सिखाया जा सकता है:

Spend – Save – Invest

उदाहरण के लिए:

₹400 — अपनी पसंद की चीज खरीदने के लिए

₹300 — Saving

₹300 — किसी Financial Goal या Investment के लिए

इससे बच्चे को कम उम्र में ही यह समझ आने लगता है कि पैसा सिर्फ खर्च करने की चीज नहीं है।

9. सबसे बड़ा Financial Gift है—Financial Education

पैसा देना आसान है।

पैसा कमाने, बचाने, निवेश करने और सही Financial Decisions लेने की समझ देना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

अगर इस रक्षाबंधन आप अपने भाई या बहन को कोई Financial Book देते हैं, उनके साथ Budget बनाते हैं, Investment के बारे में चर्चा करते हैं या उन्हें Financial Planning शुरू करने के लिए प्रेरित करते हैं, तो यह ऐसा gift हो सकता है जिसका फायदा वर्षों तक मिलता रहे।

क्योंकि:

Financial Education ऐसी संपत्ति है जिसे कोई आपसे छीन नहीं सकता।

10. इस रक्षाबंधन एक Financial Promise भी करें

इस बार राखी बांधते और बंधवाते समय एक नया संकल्प लिया जा सकता है।

भाई-बहन मिलकर एक Financial Promise करें:

"हम एक-दूसरे को सिर्फ भावनात्मक रूप से नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी मजबूत बनने में मदद करेंगे।"

इसके लिए साल में कम से कम एक बार बैठकर अपने Financial Goals पर चर्चा करें:

कितनी Saving हुई?

कितना Investment हुआ?

Emergency Fund कितना है?

कोई अनावश्यक Debt तो नहीं?

अगले वर्ष का Financial Goal क्या है?

यह छोटी-सी आदत भाई-बहन के रिश्ते को एक नए Financial Dimension से जोड़ सकती है।

रक्षाबंधन का असली Financial Lesson

रक्षाबंधन हमें सिखाता है कि रक्षा केवल आज की नहीं, भविष्य की भी होनी चाहिए।

जैसे राखी का एक छोटा-सा धागा रिश्ते की बड़ी जिम्मेदारी का प्रतीक है, वैसे ही छोटी-सी Saving भविष्य की बड़ी Financial Security की नींव बन सकती है।

इसलिए इस रक्षाबंधन:

महंगे Gift से ज्यादा जरूरी Financial Security को महत्व दें।

बड़ी-बड़ी बातों से ज्यादा जरूरी छोटी-छोटी Financial Habits बनाएं।

सिर्फ पैसा देने के बजाय Money Management सिखाएं।

और सबसे महत्वपूर्ण—

"अपने रिश्तों की तरह अपने पैसों की भी जिम्मेदारी लीजिए।"

क्योंकि Financially Strong परिवार सिर्फ ज्यादा पैसा कमाने से नहीं बनता, बल्कि सही तरीके से पैसा कमाने, बचाने, खर्च करने, निवेश करने और भविष्य की Planning करने से बनता है।

Be Your Money Manager का उद्देश्य भी यही है—आपको अपने पैसे का ऐसा Manager बनाना, जो अपने Financial Decisions को समझदारी से ले और अपने भविष्य को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में लगातार काम करे।

इस रक्षाबंधन एक नई शुरुआत करें

इस बार राखी के साथ अपने भाई या बहन को एक ऐसा उपहार दें जो केवल आज मुस्कान न दे, बल्कि कल Financial Confidence भी दे।

क्योंकि सबसे खूबसूरत राखी वही है, जिसके साथ भविष्य की सुरक्षा का संकल्प भी जुड़ा हो।

Happy Raksha Bandhan!

और इस बार कहिए—"रिश्ता भी मजबूत, Financial Future भी मजबूत।"


Rajanish Kant
सरकारी कर्ज बढ़ने तक सोने की कीमतें ऊंची रहेंगी: $10,000 लक्ष्य भूल जाएं – जॉन लाफोर्ज की राय | BeYourMoneyManager

पिछले कुछ वर्षों में सोने (Gold) की कीमतों में नाटकीय उछाल आया है। जो स्तर कभी असंभव लगते थे, वे अब वास्तविकता बन चुके हैं। फिर भी, एक प्रमुख बाजार रणनीतिकार का कहना है कि निवेशकों को सिर्फ कीमत के लक्ष्यों ($8,000, $10,000 या $12,000 प्रति औंस) पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए।

नेड डेविस रिसर्च (NDR Research) के चीफ अल्टरनेटिव स्ट्रैटेजिस्ट जॉन लाफोर्ज (John LaForge) ने किटको न्यूज के साथ बातचीत में स्पष्ट कहा कि सोने का दीर्घकालिक रुझान तब तक ऊपर की ओर बना रहेगा, जब तक दुनिया भर की सरकारें अपने बढ़ते कर्ज के बोझ से नहीं निपटतीं।

लाफोर्ज के अनुसार, “मुझे लगता है कि कीमतें तब चरम पर पहुंचेंगी जब हम कर्ज की स्थिति से निपटना सीख लेंगे। जितना लंबा हम इसे टालते रहेंगे, कर्ज चुकाए बिना और बढ़ाते रहेंगे, सोने की कीमतें उतनी ही ऊंची जा सकती हैं।”

वे कहते हैं कि $8,000, $10,000 या $12,000 जैसे आंकड़े उनके दृष्टिकोण में खास मायने नहीं रखते। “मेरे लिए कोई निश्चित बिंदु नहीं है कि ‘अरे अब 8,000 हो गया’ या ‘12,000 हो गया’। मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि जब तक सरकारी कर्ज से नहीं निपटा जाता, ट्रेंड ऊपर ही रहेगा। मुझे लगता है कि हम अभी कई सालों तक ऊंची कीमतें देख सकते हैं क्योंकि वैश्विक स्तर पर राजनीतिज्ञ और नेता इससे निपटने को तैयार नहीं दिखते।”

पिछले दशक में सोना लगभग $1,500 प्रति औंस से बढ़कर $4,000 से ऊपर पहुंच चुका है। लाफोर्ज का मानना है कि अभी भी काफी गुंजाइश बाकी है। वे वर्तमान कमोडिटी सुपरसाइकल को लगभग 6-7 साल पुराना बताते हैं और कहते हैं कि लंबे समय के रुझान के थकने का कोई सबूत नहीं है।

इस चक्र की सबसे बड़ी ताकत यह है कि केंद्रीय बैंक अब सोने की संरचनात्मक मांग का महत्वपूर्ण स्रोत बन गए हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी विदेशी भंडारों को फ्रीज किए जाने के बाद कई केंद्रीय बैंकों ने महसूस किया कि पारंपरिक रिजर्व एसेट्स सरकारी नियंत्रण के जोखिम में हैं। सोना एक दुर्लभ “बियरर एसेट” है जिसे भौतिक रूप से क्रेडिट सिस्टम के बाहर रखा जा सकता है और दुनिया भर में स्वीकार किया जाता है।

सरकारी कर्ज में भारी वृद्धि हार्ड एसेट्स के लिए सबसे बड़ा टेलविंड बन रही है। लाफोर्ज कहते हैं कि कर्ज चुकाने का कोई आसान राजनीतिक तरीका नहीं बचा है, सिवाय मुद्रा के अवमूल्यन (currency debasement) के। “इससे निपटने का कोई तरीका नहीं है सिवाय हर चीज को कमजोर करने के। यह सोने के लिए अब तक का सबसे बड़ा अनुकूल कारक है।”

अमेरिका का सरकारी कर्ज $40 ट्रिलियन से ऊपर पहुंच चुका है, लेकिन लाफोर्ज जापान को भी एक महत्वपूर्ण चेतावनी मानते हैं। पश्चिमी देश उम्मीद कर रहे थे कि जापान यील्ड कर्व कंट्रोल के जरिए लंबे समय तक उधारी लागत को दबाए रख सकता है, लेकिन अब जापानी यील्ड्स बढ़ रही हैं और दशकों की अल्ट्रा-लूज मौद्रिक नीति उलटी हो रही है।

लाफोर्ज ने सोने में महीनों लंबी सुधार (correction) के दौरान भी बुलिश रुख बनाए रखा क्योंकि सरकारी कर्ज बढ़ता रहा। उन्होंने कहा कि लंबी अवधि के मोमेंटम संकेतकों में कोई ब्लो-ऑफ टॉप सिग्नल नहीं दिखा, जो आमतौर पर सुपरसाइकल के अंत में दिखाई देते हैं। वर्तमान मोमेंटम 2011 के शिखर के आसपास देखी गई सट्टा अधिकता से ज्यादा मिड-साइकल मूव जैसा लगता है।

पोर्टफोलियो रणनीति के बारे में लाफोर्ज सुझाव देते हैं कि निवेशकों को कम से कम 10% अल्टरनेटिव एसेट्स में आवंटन करना चाहिए—लगभग 5% सोना, 3% व्यापक कमोडिटी बास्केट और 2% बिटकॉइन। सोने को सबसे ज्यादा वजन इसलिए मिलना चाहिए क्योंकि यह वर्तमान चक्र को चलाने वाले संरचनात्मक कर्ज और मौद्रिक दबावों के लिए सबसे सीधा एक्सपोजर देता है।

लाफोर्ज का निष्कर्ष साफ है: सोने के बुल मार्केट का अंत किसी निश्चित कीमत स्तर से नहीं, बल्कि तब होगा जब सरकारें राजकोषीय अनुशासन अपनाएंगी और क्रेडिट-आधारित मौद्रिक प्रणाली में विश्वास बहाल करेंगी। तब तक संरचनात्मक रुझान बदलने का कोई मजबूत कारण नहीं दिखता।

“यह पूरी तरह पटरी से नहीं उतरा है, लेकिन ऐसा लगता है जैसे ट्रेन की रफ्तार 40 मील प्रति घंटे से 120 हो गई हो। हमें इसे धीमा करना होगा, वरना ट्रैक पर नहीं रह पाएंगे।”

निष्कर्ष (BeYourMoneyManager के लिए):  

सोना सिर्फ एक कीमती धातु नहीं, बल्कि बढ़ते सरकारी कर्ज और मुद्रा अवमूल्यन के खिलाफ एक सुरक्षा कवच है। दीर्घकालिक निवेशकों को कीमत के शॉर्ट-टर्म लक्ष्यों से ज्यादा फंडामेंटल्स पर ध्यान देना चाहिए। हमेशा अपने जोखिम प्रोफाइल और वित्तीय लक्ष्यों के अनुसार पोर्टफोलियो बनाएं।

(नोट: यह लेख सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। निवेश निर्णय लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श करें।)

यह मूल लेख किटको न्यूज पर प्रकाशित जॉन लाफोर्ज के साक्षात्कार पर आधारित है 

Rajanish Kant
सोना $5,000 तक पहुंचने की तैयारी में, $10,000 सिर्फ समय की बात – स्टेट स्ट्रीट के एक्सपर्ट का बड़ा दावा |भारतीय निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है? beyourmoneymanager की सलाह l beyourmoneymanager

सोने की कीमतों में फिर से जोरदार उछाल देखने को मिल रहा है। अगस्त 2026 में सोने ने करीब 15% की बढ़ोतरी दर्ज की है, जो जनवरी 1999 के बाद सबसे बेहतर मासिक प्रदर्शन है। इस समय स्पॉट गोल्ड करीब $4,621 प्रति औंस के आसपास ट्रेड कर रहा है।

स्टेट स्ट्रीट इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट के गोल्ड स्ट्रैटेजी हेड आकाश दोषी का कहना है कि सोने की हालिया करेक्शन ने इसके लंबे समय के निवेश केस को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है। बल्कि, बढ़ते सरकारी कर्ज और वैश्विक वित्तीय चिंताओं के बीच $5,000 प्रति औंस का टारगेट साल के अंत तक फिर से मजबूत हो गया है।

क्यों बढ़ रही है सोने की चमक?

दोषी के अनुसार, “डिबेसमेंट ट्रेड” (मुद्रा की वैल्यू घटने का ट्रेड) कभी खत्म नहीं हुआ था, सिर्फ थोड़ी देर के लिए रुका था। अब ब्याज दरों और डॉलर की मजबूती के बावजूद यह फिर सक्रिय हो गया है। फेडरल रिजर्व की नीति, कमजोर अमेरिकी लेबर मार्केट डेटा और अमेरिका के बढ़ते कर्ज (जो $40 ट्रिलियन पार कर चुका है) सोने के पक्ष में काम कर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि सिर्फ अमेरिका ही नहीं, ब्रिटेन, यूरोप और जापान जैसे देशों में भी सरकारी घाटा बढ़ रहा है। ऐसे में सोना एक सुरक्षित वैश्विक मौद्रिक संपत्ति के रूप में उभर रहा है।

स्टेट स्ट्रीट का बेस-केस अनुमान है कि अगली सर्दियों की शुरुआत तक सोना $4,750 से $6,500 प्रति औंस के बीच रह सकता है। इसमें $5,000–$5,250 का स्तर जल्दी हासिल हो सकता है, खासकर अगर फेडरल रिजर्व डोविश हो जाए या कोई और मैक्रो शॉक आए।

$10,000 सोना – कब की बात, नहीं “क्या” की

आकाश दोषी का सबसे महत्वपूर्ण बयान यह है – “$10,000 सोना अब ‘कब’ की बात है, ‘क्या’ की नहीं।”

उनके अनुसार, अगर वैश्विक निवेशक सोने में अपनी स्ट्रेटेजिक एलोकेशन को मौजूदा 1% से बढ़ाकर 3% कर दें, तो अकेले इससे कीमतें $10,000 के करीब पहुंच सकती हैं। चीनी निवेशकों और सेंट्रल बैंकों की मजबूत डिमांड पहले ही $4,000 के आसपास सपोर्ट बना चुकी है। पश्चिमी ETF निवेशक भी फिर से खरीददारी बढ़ा रहे हैं।

भारतीय निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है? 

भारत में सोना हमेशा से पसंद का निवेश रहा है – चाहे वह जेवर हो, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड हो या गोल्ड ETF। वैश्विक स्तर पर बढ़ती महंगाई, कर्ज का दबाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं लंबे समय तक सोने को मजबूत रख सकती हैं।

beyourmoneymanager की सलाह:  

पोर्टफोलियो का 5-10% हिस्सा सोने में रखें (गोल्ड ETF या SGB बेहतर विकल्प)।  

सिर्फ कीमत के पीछे न भागें, लंबे समय के लिए निवेश करें।  

बाजार में करेक्शन आने पर और खरीदने का मौका देखें।

सोना कोई जादुई निवेश नहीं है, लेकिन मौजूदा वैश्विक माहौल में यह आपके पैसे की क्रय शक्ति बचाने का एक मजबूत औजार साबित हो सकता है।

आप अपनी वित्तीय योजना में सोने को कैसे शामिल कर रहे हैं? कमेंट में बताएं या www.beyourmoneymanager.com पर अपनी व्यक्तिगत सलाह के लिए संपर्क करें।

(नोट: यह लेख सिर्फ जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श जरूर लें।)

Rajanish Kant गुरुवार, 27 अगस्त 2026
मृतक के नाम पर टैक्स नोटिस आया है? नज़रअंदाज़ न करें – कानूनी उत्तराधिकारियों को क्या करना चाहिए

मृतक व्यक्ति के नाम पर इनकम टैक्स नोटिस आने पर कानूनी वारिस क्या करें? ITR फाइलिंग, बकाया टैक्स और जिम्मेदारी की पूरी जानकारी – www.beyourmoneymanager.com पर पढ़ें।

किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद भी उनके इनकम टैक्स संबंधी मामले स्वतः बंद नहीं हो जाते। अगर मृतक की आय बेसिक एग्जेंप्शन लिमिट से ज्यादा थी और उन्होंने ITR फाइल नहीं किया, या बकाया टैक्स, पेंडिंग प्रोसीडिंग्स हैं, तो कानूनी उत्तराधिकारियों (लीगल हेयर) को इन मामलों को संभालना पड़ सकता है। कई बार परिवारिक विवाद या अन्य कारणों से कानूनी वारिस तय करना भी मुश्किल हो जाता है।

ऐसे में ज्यूरिसडिक्शनल असेसिंग ऑफिसर को सूचित करना जरूरी है। अगर कोई कानूनी वारिस न हो, तो जो व्यक्ति मृतक की संपत्ति का उत्तराधिकारी बनता है, वही टैक्स मामलों की जिम्मेदारी लेता है।

क्या इनकम टैक्स विभाग मृतक के नाम पर नोटिस जारी कर सकता है?

जब विभाग को पता चल जाए या उसे यथोचित रूप से पता होना चाहिए कि करदाता की मृत्यु हो चुकी है, तो वह मृतक के नाम पर नया नोटिस वैध रूप से जारी नहीं कर सकता।

हालांकि, मृत्यु के समय चल रही प्रोसीडिंग्स को मृतक के कानूनी प्रतिनिधि के खिलाफ जारी रखा जा सकता है। कानूनी वारिस पर मृत्यु की जानकारी देने का कोई वैधानिक दायित्व नहीं है, लेकिन उन्हें इनकम टैक्स ई-फाइलिंग पोर्टल पर मृतक के कानूनी प्रतिनिधि के रूप में रजिस्टर कर लेना चाहिए।

अगर विभाग मृत्यु की जानकारी होने के बावजूद मृतक के नाम पर नया नोटिस जारी करता है, तो उसकी वैधता को चुनौती दी जा सकती है।

अगर करदाता ITR फाइल करने से पहले मर जाए तो क्या?

इनकम टैक्स एक्ट के अनुसार मृत्यु के साथ टैक्स देनदारी खत्म नहीं होती। यह “लीगल रिप्रेजेंटेटिव” (आमतौर पर एग्जिक्यूटर या एडमिनिस्ट्रेटर, या संपत्ति का उत्तराधिकारी) पर चली जाती है।

कानूनी प्रतिनिधि को वित्तीय वर्ष की शुरुआत से मृत्यु की तारीख तक का रिटर्न (डेट-ऑफ-डेथ रिटर्न) फाइल करना होता है। अगर पिछले वर्ष का रिटर्न भी बाकी है, तो वह भी फाइल करना पड़ता है।

कानूनी वारिस को ये कदम उठाने चाहिए:

ई-फाइलिंग पोर्टल पर “लीगल हेयर” के रूप में रजिस्टर करें (Authorised Representative → Register as Representative)। मृत्यु प्रमाण पत्र, मृतक और वारिस का PAN, तथा लीगल हेयर प्रूफ (सक्सेशन सर्टिफिकेट, विल या पोर्टल का अफिडेविट फॉर्मेट) अपलोड करें।

ज्यूरिसडिक्शनल AO/CPC की मंजूरी के बाद ही ई-वेरिफाई या फाइल कर सकते हैं।

सामान्य ड्यू डेट या एक्सटेंडेड ड्यू डेट के अंदर फाइल करें। अगर मृत्यु ड्यू डेट के करीब हो तो सेक्शन 119(2)(b) के तहत कंडोनेशन के लिए आवेदन कर सकते हैं।

फॉर्म 26AS, AIS, TIS, बैंक स्टेटमेंट और कैपिटल गेन्स डेटा का मिलान करें। मृत्यु के बाद की आय (जैसे ब्याज) मृतक के रिटर्न में शामिल नहीं की जाती।

बकाया टैक्स की जिम्मेदारी किसकी?

कानूनी प्रतिनिधि मृतक की बकाया टैक्स देनदारी चुकाता है, लेकिन सिर्फ मृतक की संपत्ति (एस्टेट) से और उतनी ही सीमा तक जितनी संपत्ति उपलब्ध हो।

अगर कानूनी प्रतिनिधि टैक्स देनदारी बाकी रहते हुए संपत्ति बेचता, ट्रांसफर करता या उस पर चार्ज बनाता है, तो वह व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी हो सकता है – लेकिन सिर्फ उतनी संपत्ति के मूल्य तक जितनी उसने ट्रांसफर की। इसलिए बकाया टैक्स चेक किए बिना संपत्ति का बंटवारा या ट्रांसफर न करें।

मृतक के नाम पर टैक्स नोटिस आने पर क्या करें?

सबसे पहले ई-फाइलिंग पोर्टल पर मृतक के कानूनी प्रतिनिधि के रूप में रजिस्टर करें।

नोटिस की प्रकृति समझें (स्क्रूटिनी, रिएसेसमेंट, डिमांड या इंफॉर्मेशन रिक्वेस्ट) और जवाब देने की समय सीमा नोट करें।

नोटिस कब और किसके नाम पर जारी हुआ, यह जांचें। अगर मृत्यु के बाद पहली बार और मृतक के नाम पर जारी हुआ है, तो वैधता को चुनौती दी जा सकती है।

अगर नोटिस मृत्यु से पहले वैध रूप से जारी हुआ था या कानूनी प्रतिनिधि के नाम पर नया नोटिस आया है, तो समय पर जवाब दें, जरूरी दस्तावेज जमा करें और प्रोसीडिंग्स में भाग लें।

याद रखें – कानूनी प्रतिनिधि की जिम्मेदारी मृतक की संपत्ति के मूल्य तक सीमित होती है। व्यक्तिगत जेब से भुगतान की बाध्यता नहीं है, अगर एस्टेट पर्याप्त न हो।

निष्कर्ष

मृत्यु के बाद टैक्स मामले अपने आप बंद नहीं होते। कानूनी वारिसों को पेंडिंग रिटर्न फाइल करने, वैध प्रोसीडिंग्स का जवाब देने और एस्टेट से टैक्स चुकाने की जिम्मेदारी निभानी पड़ सकती है। नोटिस आने पर तुरंत रजिस्ट्रेशन करें, समय सीमा का ध्यान रखें और जरूरत पड़ने पर टैक्स एक्सपर्ट या CA से सलाह लें।

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Rajanish Kant बुधवार, 26 अगस्त 2026
Health Insurance Cover कितना चाहिए? उम्र, शहर और परिवार के अनुसार जानें – ₹5-10 लाख अब पर्याप्त नहीं

मेडिकल इन्फ्लेशन 12-14% के साथ ₹5-10 लाख का हेल्थ कवर अब कम पड़ रहा है। उम्र, शहर और परिवार के आकार के आधार पर सही सम इंश्योर्ड कैसे चुनें – बेयोरमनीमैनेजर पर पूरा गाइड।

आजकल कई लोग सोचते हैं कि ₹5 लाख या ₹10 लाख का हेल्थ इंश्योरेंस काफी है। लेकिन मेडिकल कॉस्ट तेजी से बढ़ रही है। उद्योग के अनुमान के अनुसार मेडिकल इन्फ्लेशन सालाना 12-14% के आसपास है। मेट्रो शहर के अस्पताल में एक कार्डियक प्रक्रिया या कैंसर ट्रीटमेंट आसानी से ₹15-25 लाख या उससे ज्यादा खर्च करा सकता है। इसलिए सही सम इंश्योर्ड चुनना अब उम्र, रहने की जगह, परिवार के आकार और स्वास्थ्य जरूरतों पर निर्भर करता है।

उम्र सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर है

हेल्थ कवर सिर्फ इनकम के आधार पर नहीं तय करना चाहिए। उम्र बढ़ने के साथ मेडिकल खर्च भी बढ़ते हैं। एक उदाहरण के अनुसार, अगर आज 30 साल की उम्र में ₹5 लाख पर्याप्त लगता है, तो 6-8% इन्फ्लेशन लगाने पर 50 साल की उम्र तक लगभग ₹15 लाख की जरूरत पड़ सकती है। दो वयस्कों के फ्लोटर पॉलिसी के लिए यह आंकड़ा करीब ₹30 लाख तक पहुंच सकता है। जल्दी खरीदने से प्रीमियम कम रहता है और बाद में बीमारी होने पर कवर बढ़ाने में दिक्कत नहीं होती।

परिवार का आकार और स्वास्थ्य इतिहास

फैमिली फ्लोटर पॉलिसी में एक सम इंश्योर्ड कई सदस्यों में साझा होता है। इसलिए व्यक्तिगत कवर से ज्यादा राशि लेनी चाहिए। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि फैमिली फ्लोटर के लिए व्यक्तिगत जरूरत का कम से कम तीन गुना कवर रखें। परिवार में पहले से बीमारी या मेडिकल हिस्ट्री हो तो और ध्यान दें।

शहर के अनुसार कवर

जहां आप रहते हैं, वहां के हेल्थकेयर कॉस्ट बहुत फर्क डालते हैं।  

मेट्रो शहरों में विशेषज्ञ कम से कम ₹15-20 लाख, कुछ तो ₹25 लाख तक का कवर सुझाते हैं।  

टियर-2 और टियर-3 शहरों में न्यूनतम ₹10 लाख पर्याप्त हो सकता है।  

लेकिन याद रखें, स्पेशलाइज्ड ट्रीटमेंट के लिए मेट्रो जाना पड़ सकता है। इसलिए ऊंचे खर्चों को भी ध्यान में रखें।

सीनियर सिटीजन माता-पिता के लिए अलग पॉलिसी

बुजुर्ग माता-पिता को फैमिली फ्लोटर में शामिल न करें। उनके इलाज का खर्च शेयर किए गए सम इंश्योर्ड को जल्दी खत्म कर सकता है। 60 साल के बाद इलाज का खर्च तेजी से बढ़ता है। आंकड़ों के अनुसार 60+ उम्र के लोगों का औसत क्लेम करीब ₹1.77 लाख है, जबकि 25 साल से कम उम्र वालों का सिर्फ ₹65,000 के आसपास।

बड़ा कवर कैसे लें – एक पॉलिसी या बेस + सुपर टॉप-अप?

₹1 करोड़ जैसा बड़ा कवर एक ही पॉलिसी में लिया जा सकता है या छोटे बेस कवर के साथ सुपर टॉप-अप जोड़कर। उदाहरण के लिए ₹10 लाख बेस और ₹20 लाख टॉप-अप हो तो ₹15 लाख के बिल में पहले बेस काम आएगा और बाकी टॉप-अप से कवर होगा। कौन सा विकल्प सस्ता और आसान है, यह आपकी जरूरत, पॉलिसी टर्म्स और बजट पर निर्भर करता है।

सुपर टॉप-अप शुरुआत में कम प्रीमियम वाला विकल्प है, लेकिन क्लेम बढ़ने पर महंगा पड़ सकता है और कुछ पाबंदियां हो सकती हैं। एक बड़ी सिंगल पॉलिसी में कैशलेस क्लेम प्रोसेसिंग आसान रहती है। अगर बेस और टॉप-अप अलग-अलग कंपनियों के हों तो कभी-कभी रीइम्बर्समेंट की जरूरत पड़ सकती है।

नियमित रिव्यू जरूरी

एक बार सही कवर लेना काफी नहीं। हर दो साल में या शादी, बच्चे होने, रिटायरमेंट जैसे बड़े बदलाव पर सम इंश्योर्ड की समीक्षा करें। जल्दी शुरू करने से फायदा है क्योंकि बाद में बीमारी होने पर कवर बढ़ाना मुश्किल हो जाता है। कंपनी का ग्रुप कवर रिटायरमेंट के बाद खत्म हो सकता है, इसलिए खुद का कवर तैयार रखें।

मेडिकल इमरजेंसी फंड भी बनाएं

हेल्थ इंश्योरेंस हर खर्च को कवर नहीं करता। वेटिंग पीरियड वाले खर्च, डेंटल, डायग्नोस्टिक्स, एक्सपेरिमेंटल ट्रीटमेंट या क्लेम रिजेक्ट होने की स्थिति के लिए अलग से मेडिकल कॉर्पस बनाएं। यह फंड इंश्योरेंस से अलग रखें क्योंकि इस्तेमाल करने पर यह खत्म हो जाता है।

निष्कर्ष

₹5-10 लाख का पुराना सोच अब काम नहीं आता। अपनी उम्र, शहर, परिवार और भविष्य की जरूरतों के हिसाब से कवर चुनें। बेस पॉलिसी के साथ सुपर टॉप-अप का कॉम्बिनेशन किफायती तरीका हो सकता है। नियमित रिव्यू और मेडिकल इमरजेंसी फंड से आप और परिवार सुरक्षित रहेंगे।

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Rajanish Kant
NPS Retirement Income: 5 तरह के एन्युटी प्लान – अकेला, पति-पत्नी या परिवार के लिए कौन सा चुनें?

 
NPS खाता मैच्योर होने पर पूरा पैसा एक साथ नहीं निकाल सकते। नियमों के मुताबिक कम से कम 40% कॉर्पस से एन्युटी खरीदनी पड़ती है, जो आपकी बाकी जिंदगी की नियमित आय बनती है। सही एन्युटी चुनना बहुत जरूरी है क्योंकि यह फैसला दशकों तक आपकी मासिक इनकम, पति/पत्नी की सुरक्षा और परिवार को मिलने वाले पैसे को तय करता है।

यहाँ NPS में उपलब्ध मुख्य 5 प्रकार के एन्युटी प्लान बताए गए हैं, ताकि आप अपनी स्थिति के हिसाब से सही विकल्प चुन सकें।

1. सिंगल लाइफ एन्युटी (Life Only Annuity)

अगर आप अकेले हैं और कोई आर्थिक रूप से आप पर निर्भर नहीं है, तो यह सबसे ज्यादा मासिक पेंशन देता है।  

फायदा: सबसे ऊँचा पेआउट।  

नुकसान: आपकी मृत्यु के बाद पेंशन पूरी तरह बंद हो जाती है, परिवार को कुछ नहीं मिलता।  

उपयुक्त: जिनके पास अन्य पेंशन या बचत है और कोई आश्रित नहीं।

2. जॉइंट लाइफ एन्युटी

पति-पत्नी दोनों के लिए सुरक्षा। आपकी मृत्यु के बाद भी पति/पत्नी को तय प्रतिशत (आमतौर पर 50%, 75% या 100%) पेंशन मिलती रहती है।  

फायदा: जीवनसाथी की सुरक्षा।  

नुकसान: सिंगल लाइफ की तुलना में मासिक राशि कम होती है क्योंकि भुगतान दो जिंदगियों तक चल सकता है।  

उपयुक्त: विवाहित जोड़े जहाँ एक साथी आर्थिक रूप से निर्भर है।

3. लाइफ एन्युटी विद रिटर्न ऑफ परचेज प्राइस

आपको आजीवन पेंशन मिलती है। मृत्यु के बाद मूल निवेश राशि नॉमिनी को वापस मिल जाती है।  

फायदा: परिवार को पूंजी वापस मिलती है।  

नुकसान: नियमित पेंशन थोड़ी कम होती है।

4. पीरियड सर्टेन एन्युटी

निश्चित अवधि (जैसे 10 या 20 साल) तक भुगतान की गारंटी। अगर उस अवधि से पहले मृत्यु हो जाए तो बाकी भुगतान नॉमिनी को मिलता है।  

फायदा: उत्तराधिकारियों के लिए सुरक्षा।  

नुकसान: शुद्ध लाइफ ओनली प्लान से कम पेआउट।

5. इंक्रीजिंग एन्युटी (Increasing Annuity)

पेंशन हर साल एक निश्चित दर (जैसे 3% या 5%) से बढ़ती रहती है।  

फायदा: महंगाई से बचाव। अस्पताल के खर्च और अन्य लागतें बढ़ने पर मददगार।  

नुकसान: शुरुआत में मासिक राशि कम होती है।  

उपयुक्त: लंबी रिटायरमेंट अवधि की उम्मीद रखने वालों के लिए।

एन्युटी चुनने से पहले ये 5 बातें जरूर चेक करें

सिर्फ सबसे ऊँचे पेआउट वाले प्लान पर न जाएं। फ्लेक्सिबिलिटी और महंगाई सुरक्षा भी देखें।

सभी PFRDA-एम्पैनल्ड एन्युटी सर्विस प्रोवाइडर्स की दरों की तुलना करें। छोटी-छोटी अंतर दशकों में बड़ा फर्क डालते हैं।

पेआउट फ्रीक्वेंसी (मासिक, तिमाही या वार्षिक) अपनी खर्च की आदत के अनुसार चुनें।

याद रखें कि एन्युटी से मिलने वाली पेंशन आपकी इनकम स्लैब के अनुसार पूरी तरह टैक्सेबल होती है (लंप सम निकासी पर टैक्स नहीं लगता)।

जीवनसाथी की आर्थिक निर्भरता को ध्यान में रखकर ही सिंगल लाइफ चुनें क्योंकि फैसला आमतौर पर स्थायी होता है।

निष्कर्ष

कोई एक “सबसे अच्छा” एन्युटी नहीं है। सही विकल्प आपकी स्थिति पर निर्भर करता है:  

अकेले हैं → सिंगल लाइफ  

पति-पत्नी की सुरक्षा चाहिए → जॉइंट लाइफ  

परिवार को कुछ छोड़ना है → रिटर्न ऑफ परचेज प्राइस या पीरियड सर्टेन  

महंगाई की चिंता है → इंक्रीजिंग एन्युटी  

अपने आश्रितों, स्वास्थ्य, अन्य आय स्रोतों और अपेक्षित खर्चों का आकलन करके ही फैसला लें। एक बार खरीदने के बाद यह निर्णय ज्यादातर मामलों में बदलना मुश्किल होता है।

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Rajanish Kant
Bank of America Survey: सोना सबसे ज्यादा undervalued, US डेट चिंताओं से गोल्ड में बुलिश बेट बढ़ी|भारतीय निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है?l BeYourMoneyManager

बैंक ऑफ अमेरिका के अगस्त 2026 सर्वे में 16% फंड मैनेजर्स ने सोने को undervalued बताया। CFTC डेटा में तीसरे सप्ताह भी गोल्ड पर बुलिश पोजीशन बढ़ी। जानें गोल्ड इन्वेस्टमेंट के मौके और जोखिम।

बैंक ऑफ अमेरिका के नए सर्वे में सोना फिर चर्चा में आ गया है। अगस्त 2026 के ग्लोबल फंड मैनेजर सर्वे के अनुसार सोना मार्च 2023 के बाद सबसे ज्यादा undervalued नजर आ रहा है। सिर्फ 6% से बढ़कर अब 16% फंड मैनेजर्स मानते हैं कि गोल्ड अभी सस्ता है। इसी दौरान स्पेक्युलेटिव इन्वेस्टर्स ने लगातार तीसरे हफ्ते गोल्ड पर अपनी बुलिश बेट बढ़ा दी है।

क्यों बढ़ रही है गोल्ड में दिलचस्पी?

अमेरिकी सरकार के कर्ज की स्थिरता को लेकर बढ़ती अनिश्चितता ने “डिबेसमेंट ट्रेड” को फिर जिंदा कर दिया है। जब डॉलर की वैल्यू पर शक बढ़ता है, तो निवेशक सुरक्षित ठिकाने की तलाश में सोने की ओर रुख करते हैं।

CFTC की Commitments of Traders रिपोर्ट (सप्ताह समाप्त 18 अगस्त) के अनुसार मनी मैनेजर्स ने Comex गोल्ड फ्यूचर्स में लॉन्ग पोजीशन 5,961 कॉन्ट्रैक्ट बढ़ाकर 154,595 कर दी। शॉर्ट पोजीशन भी थोड़ी बढ़ी, लेकिन नेट लॉन्ग पोजीशन 141,648 कॉन्ट्रैक्ट पर पहुंच गई। यह सितंबर के अंत के बाद सबसे ऊंचा स्तर है। पिछले तीन हफ्तों में नेट लेंथ में 18% की बढ़ोतरी हुई है।

हालांकि यह साल का सबसे ऊंचा बुलिश स्तर है, फिर भी एक साल पहले और साल की शुरुआत की तुलना में सेंटीमेंट अभी कमजोर है।

बैंक ऑफ अमेरिका का नजरिया

बैंक ऑफ अमेरिका की ग्लोबल रिसर्च हेड कैंडेस ब्राउनिंग प्लैट ने कहा कि मौजूदा इन्वेस्टर खरीद $4,000 प्रति औंस के आसपास के गोल्ड प्राइस से मेल खाती है। $5,000 के स्तर तक पहुंचने के लिए खरीद में और तेजी चाहिए। सेंट्रल बैंकों की खरीद पहले से ही मजबूत है (जून में 12 महीने के औसत से काफी ऊपर)। अगर जैक्सन होल मीटिंग में डॉविश संकेत मिले तो गोल्ड के लिए यह सकारात्मक साबित हो सकता है।

जोखिम भी हैं

सोना जुलाई के निचले स्तर से रिकवर कर चुका है, लेकिन तेल की कीमतों में बढ़ोतरी महंगाई की आशंका बढ़ा रही है। इससे फेडरल रिजर्व साल के अंत तक ब्याज दरें बढ़ाने पर मजबूर हो सकता है। TD सिक्योरिटीज के बार्ट मेलेक का मानना है कि डॉलर डिबेसमेंट की आशंका गोल्ड को सपोर्ट देगी, लेकिन शॉर्ट टर्म में रेट बढ़ने का जोखिम $5,350 के टारगेट तक पहुंचने में देरी कर सकता है।

भारतीय निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है?

भारत में गोल्ड हमेशा से पसंदीदा एसेट रहा है। महंगाई, रुपये की कमजोरी और ग्लोबल अनिश्चितता के समय फिजिकल गोल्ड, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड या गोल्ड ETF में निवेश पोर्टफोलियो को बैलेंस कर सकता है। लेकिन याद रखें—कोई भी निवेश जोखिम मुक्त नहीं होता। प्राइस में उतार-चढ़ाव हो सकता है, इसलिए अपनी रिस्क क्षमता और लंबे समय के लक्ष्य के हिसाब से फैसला लें।

BeYourMoneyManager पर हम हमेशा कहते हैं—अपना पैसा समझदारी से मैनेज करें। गोल्ड को सिर्फ भावनाओं से नहीं, बल्कि डेटा और अपनी जरूरत के आधार पर देखें।

नोट: यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी के उद्देश्य से है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह जरूर लें।

Rajanish Kant
विरासत में मिली प्रॉपर्टी बेचने पर कैपिटल गेन्स टैक्स कौन भरेगा? उत्तराधिकारी कैसे पाएं टैक्स राहत | BeYourMoneyManager
 

विरासत में मिली प्रॉपर्टी बेचने पर इनकम टैक्स का बोझ कई परिवारों में विवाद का कारण बन जाता है। कानूनी उत्तराधिकार, सेल डीड, बैंक ट्रांजेक्शन और इनकम टैक्स रिटर्न में असंगति होने पर समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। इसलिए प्रॉपर्टी बेचने से पहले हर उत्तराधिकारी का हिस्सा साफ-साफ तय और डॉक्यूमेंट करना जरूरी है।

उत्तराधिकारियों में टैक्स देनदारी कैसे बंटती है?

वसीयत या लागू उत्तराधिकार कानून के तहत प्रॉपर्टी जब कानूनी उत्तराधिकारियों को मिलती है, तो हर उत्तराधिकारी को उसका निर्धारित हिस्सा मिलता है। जब उत्तराधिकारी मिलकर प्रॉपर्टी बेचते हैं, तो कैपिटल गेन्स टैक्स आमतौर पर उनके स्वामित्व हिस्से के अनुपात में ही लगता है। पूरा सेल अमाउंट एक उत्तराधिकारी के खाते में जमा होने से यह नियम नहीं बदलता।

हालांकि, अगर रिकॉर्ड्स मेल नहीं खाते तो टैक्स रिपोर्टिंग में गड़बड़ी हो सकती है। इसलिए उत्तराधिकार/पार्टिशन दस्तावेज, सेल डीड, पैसे की प्राप्ति और हर PAN पर TDS कटौती एक जैसे होने चाहिए।

कैपिटल गेन्स की गणना कैसे होती है?

विरासत में मिली प्रॉपर्टी के लिए उत्तराधिकारी आमतौर पर पिछले मालिक की मूल लागत (और पात्र सुधार लागत) अपनाता है। हर उत्तराधिकारी अपनी हिस्सेदारी के अनुसार सेल प्राइस, अधिग्रहण/सुधार लागत और ट्रांसफर खर्चों के आधार पर कैपिटल गेन्स निकालता है।

पिछले मालिक की होल्डिंग अवधि भी गिनी जाती है। अगर प्रॉपर्टी 1 अप्रैल 2001 से पहले अधिग्रहित हुई हो, तो उस तारीख का फेयर मार्केट वैल्यू (FMV) लागत के रूप में लिया जा सकता है। जमीन या इमारत के मामले में यह FMV 1 अप्रैल 2001 के स्टांप ड्यूटी वैल्यू से ज्यादा नहीं हो सकता।

अगर सेल प्राइस स्टांप ड्यूटी वैल्यू से कम है, तो कुछ शर्तों के साथ स्टांप ड्यूटी वैल्यू को सेल कंसीडरेशन माना जा सकता है।

कैपिटल गेन्स टैक्स राहत कैसे मिलती है?

टैक्स छूट हर उत्तराधिकारी के अपने कैपिटल गेन्स हिस्से और उसके रीइन्वेस्टमेंट पर अलग-अलग निर्भर करती है। रेसिडेंशियल हाउस, निर्दिष्ट बॉन्ड्स या कृषि भूमि में निवेश पर Income Tax Act 2025 के संबंधित प्रावधानों (पुराने Section 54 सीरीज के अनुरूप) के तहत छूट मांगी जा सकती है।

एक उत्तराधिकारी का निवेश दूसरे को छूट नहीं दिलाता। हर किसी को अपनी सीमाएं, समयसीमा और शर्तें खुद पूरी करनी होती हैं।

Section 54 (नए कानून में Section 82) के तहत छूट का तरीका

रेसिडेंशियल प्रॉपर्टी की बिक्री से हुए लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स को भारत में दूसरी रेसिडेंशियल हाउस प्रॉपर्टी खरीदने/बनाने पर छूट मिल सकती है।

नई प्रॉपर्टी खरीद: ट्रांसफर से 1 साल पहले या 2 साल बाद तक  

निर्माण: ट्रांसफर से 3 साल के अंदर  

अगर कैपिटल गेन्स नई प्रॉपर्टी की लागत से ज्यादा है तो सिर्फ लागत जितनी राशि छूटती है। गेन्स ₹10 करोड़ से ज्यादा होने पर अतिरिक्त राशि पर टैक्स लगता है। गेन्स ₹2 करोड़ तक होने पर एक बार जीवन में दो रेसिडेंशियल हाउस में निवेश का विकल्प भी उपलब्ध है।

अगर रिटर्न फाइलिंग की ड्यू डेट तक पूरा उपयोग नहीं हुआ तो बची राशि Capital Gains Account Scheme (CGAS) में जमा करनी पड़ती है। 3 साल बाद बची अनुपयोगी राशि टैक्सेबल हो जाती है। नई प्रॉपर्टी 3 साल के अंदर बेचने पर छूट वापस ले ली जाती है।

ITR और डॉक्यूमेंटेशन

हर उत्तराधिकारी को अपनी हिस्सेदारी का कैपिटल गेन्स ITR में सही-सही दिखाना चाहिए (आमतौर पर ITR-2, बिजनेस इनकम होने पर ITR-3/4)। सेल कंसीडरेशन, स्टांप ड्यूटी वैल्यू, ऐतिहासिक लागत, सुधार खर्च, ट्रांसफर खर्च और क्लेम की गई छूट का सही खुलासा जरूरी है। TDS भी हर सेलर के PAN पर उसके हिस्से के अनुसार रिपोर्ट होना चाहिए। नॉन-रेजिडेंट उत्तराधिकारी होने पर अलग TDS नियम लागू हो सकते हैं।

निष्कर्ष: विरासत की प्रॉपर्टी बेचते समय स्वामित्व हिस्सा, लागत गणना और छूट का दावा व्यक्तिगत रूप से साफ रखें। सही डॉक्यूमेंटेशन और समय पर प्लानिंग से टैक्स विवाद और अतिरिक्त बोझ से बचा जा सकता है। विस्तृत सलाह के लिए योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट से जरूर संपर्क करें।


Rajanish Kant सोमवार, 24 अगस्त 2026