
विरासत में मिली प्रॉपर्टी बेचने पर इनकम टैक्स का बोझ कई परिवारों में विवाद का कारण बन जाता है। कानूनी उत्तराधिकार, सेल डीड, बैंक ट्रांजेक्शन और इनकम टैक्स रिटर्न में असंगति होने पर समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। इसलिए प्रॉपर्टी बेचने से पहले हर उत्तराधिकारी का हिस्सा साफ-साफ तय और डॉक्यूमेंट करना जरूरी है।
उत्तराधिकारियों में टैक्स देनदारी कैसे बंटती है?
वसीयत या लागू उत्तराधिकार कानून के तहत प्रॉपर्टी जब कानूनी उत्तराधिकारियों को मिलती है, तो हर उत्तराधिकारी को उसका निर्धारित हिस्सा मिलता है। जब उत्तराधिकारी मिलकर प्रॉपर्टी बेचते हैं, तो कैपिटल गेन्स टैक्स आमतौर पर उनके स्वामित्व हिस्से के अनुपात में ही लगता है। पूरा सेल अमाउंट एक उत्तराधिकारी के खाते में जमा होने से यह नियम नहीं बदलता।
हालांकि, अगर रिकॉर्ड्स मेल नहीं खाते तो टैक्स रिपोर्टिंग में गड़बड़ी हो सकती है। इसलिए उत्तराधिकार/पार्टिशन दस्तावेज, सेल डीड, पैसे की प्राप्ति और हर PAN पर TDS कटौती एक जैसे होने चाहिए।
कैपिटल गेन्स की गणना कैसे होती है?
विरासत में मिली प्रॉपर्टी के लिए उत्तराधिकारी आमतौर पर पिछले मालिक की मूल लागत (और पात्र सुधार लागत) अपनाता है। हर उत्तराधिकारी अपनी हिस्सेदारी के अनुसार सेल प्राइस, अधिग्रहण/सुधार लागत और ट्रांसफर खर्चों के आधार पर कैपिटल गेन्स निकालता है।
पिछले मालिक की होल्डिंग अवधि भी गिनी जाती है। अगर प्रॉपर्टी 1 अप्रैल 2001 से पहले अधिग्रहित हुई हो, तो उस तारीख का फेयर मार्केट वैल्यू (FMV) लागत के रूप में लिया जा सकता है। जमीन या इमारत के मामले में यह FMV 1 अप्रैल 2001 के स्टांप ड्यूटी वैल्यू से ज्यादा नहीं हो सकता।
अगर सेल प्राइस स्टांप ड्यूटी वैल्यू से कम है, तो कुछ शर्तों के साथ स्टांप ड्यूटी वैल्यू को सेल कंसीडरेशन माना जा सकता है।
कैपिटल गेन्स टैक्स राहत कैसे मिलती है?
टैक्स छूट हर उत्तराधिकारी के अपने कैपिटल गेन्स हिस्से और उसके रीइन्वेस्टमेंट पर अलग-अलग निर्भर करती है। रेसिडेंशियल हाउस, निर्दिष्ट बॉन्ड्स या कृषि भूमि में निवेश पर Income Tax Act 2025 के संबंधित प्रावधानों (पुराने Section 54 सीरीज के अनुरूप) के तहत छूट मांगी जा सकती है।
एक उत्तराधिकारी का निवेश दूसरे को छूट नहीं दिलाता। हर किसी को अपनी सीमाएं, समयसीमा और शर्तें खुद पूरी करनी होती हैं।
Section 54 (नए कानून में Section 82) के तहत छूट का तरीका
रेसिडेंशियल प्रॉपर्टी की बिक्री से हुए लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स को भारत में दूसरी रेसिडेंशियल हाउस प्रॉपर्टी खरीदने/बनाने पर छूट मिल सकती है।
नई प्रॉपर्टी खरीद: ट्रांसफर से 1 साल पहले या 2 साल बाद तक
निर्माण: ट्रांसफर से 3 साल के अंदर
अगर कैपिटल गेन्स नई प्रॉपर्टी की लागत से ज्यादा है तो सिर्फ लागत जितनी राशि छूटती है। गेन्स ₹10 करोड़ से ज्यादा होने पर अतिरिक्त राशि पर टैक्स लगता है। गेन्स ₹2 करोड़ तक होने पर एक बार जीवन में दो रेसिडेंशियल हाउस में निवेश का विकल्प भी उपलब्ध है।
अगर रिटर्न फाइलिंग की ड्यू डेट तक पूरा उपयोग नहीं हुआ तो बची राशि Capital Gains Account Scheme (CGAS) में जमा करनी पड़ती है। 3 साल बाद बची अनुपयोगी राशि टैक्सेबल हो जाती है। नई प्रॉपर्टी 3 साल के अंदर बेचने पर छूट वापस ले ली जाती है।
ITR और डॉक्यूमेंटेशन
हर उत्तराधिकारी को अपनी हिस्सेदारी का कैपिटल गेन्स ITR में सही-सही दिखाना चाहिए (आमतौर पर ITR-2, बिजनेस इनकम होने पर ITR-3/4)। सेल कंसीडरेशन, स्टांप ड्यूटी वैल्यू, ऐतिहासिक लागत, सुधार खर्च, ट्रांसफर खर्च और क्लेम की गई छूट का सही खुलासा जरूरी है। TDS भी हर सेलर के PAN पर उसके हिस्से के अनुसार रिपोर्ट होना चाहिए। नॉन-रेजिडेंट उत्तराधिकारी होने पर अलग TDS नियम लागू हो सकते हैं।
निष्कर्ष: विरासत की प्रॉपर्टी बेचते समय स्वामित्व हिस्सा, लागत गणना और छूट का दावा व्यक्तिगत रूप से साफ रखें। सही डॉक्यूमेंटेशन और समय पर प्लानिंग से टैक्स विवाद और अतिरिक्त बोझ से बचा जा सकता है। विस्तृत सलाह के लिए योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट से जरूर संपर्क करें।









