Net NPA 1% से नीचे, लेकिन ₹19 लाख करोड़ के Loan Write-off की असली कहानी क्या है? आखिर बैंक का पैसा कहां गया?

बैंकिंग सेक्टर में Net NPA 1% से नीचे आ गया है। सुनने में यह बड़ी उपलब्धि लगती है। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि बैंकों के खराब कर्ज की समस्या खत्म हो गई है?

Shankar Aiyyar अपने कॉलम में इसी सवाल को उठाते हैं।

₹19 लाख करोड़ के कर्ज हुए Write-off

पिछले **11 वर्षों में बैंकों ने करीब ₹19 लाख करोड़ के Loans को Write-off किया है।**

लेकिन Write-off का मतलब यह नहीं है कि कर्ज माफ कर दिया गया या बैंक ने पैसा छोड़ दिया। इसका मतलब है कि बैंक ने उस खराब कर्ज को अपनी नियमित Balance Sheet से अलग कर दिया और उसकी Recovery की प्रक्रिया जारी रह सकती है।

सबसे बड़ा सवाल है—इन Write-off किए गए Loans में से वास्तव में कितना पैसा वापस आया?**

Recovery Rate सिर्फ 35%

वित्त वर्ष **2024-25 में Write-off किए गए Loans की Recovery Rate करीब 35% रही।**

यानी आसान भाषा में कहें तो—

**हर ₹100 के Write-off Loan में केवल ₹35 की Recovery हुई।**

पिछले पांच वर्षों का आंकड़ा भी चिंता पैदा करता है। इस अवधि में बैंकों ने करीब **₹9.23 लाख करोड़ के Loans Write-off किए**, लेकिन इनमें से केवल **₹2.10 लाख करोड़ ही वापस वसूल हो सके।**

यानी बड़ी रकम अभी भी Recovery के इंतजार में है।

Net NPA 1% से कम—तो फिर समस्या कहां है?

आज बैंकों का **Net NPA 1% से नीचे** है। यह निश्चित रूप से बैंकिंग सिस्टम की मजबूती का संकेत माना जा सकता है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

Net NPA और वास्तविक Cash Recovery एक ही चीज नहीं हैं।**

किसी Loan को Balance Sheet से हटाने या उसके खिलाफ Provision बनाने से बैंक का reported NPA कम हो सकता है। लेकिन इसका यह मतलब जरूरी नहीं कि पूरा पैसा वास्तव में बैंक के पास वापस आ गया है।

यही कारण है कि **कम Net NPA को देखकर यह मान लेना कि Bad Loans की समस्या पूरी तरह खत्म हो गई है, सही तस्वीर नहीं हो सकती।**

₹1.77 लाख करोड़ के सामने 2,104 Wilful Defaulters

जून 2025 तक Public Sector Banks (PSBs) द्वारा रिपोर्ट किए गए **2,104 Wilful Defaulters पर करीब ₹1.77 लाख करोड़ की राशि बकाया थी।**

यह आंकड़ा बताता है कि बैंकिंग सिस्टम में ऐसे मामलों की समस्या अभी भी मौजूद है जहां कर्ज चुकाने की क्षमता या जिम्मेदारी के बावजूद भुगतान नहीं किया गया।

IBC का वादा और जमीनी हकीकत

Insolvency and Bankruptcy Code यानी **IBC** से उम्मीद थी कि खराब Loans की Recovery तेज होगी।

कानून के तहत Insolvency Case को **14 दिनों में Admit** करने और Resolution Process को सामान्यतः **330 दिनों के भीतर पूरा करने** का लक्ष्य रखा गया है।

लेकिन व्यवहार में तस्वीर अलग दिखाई देती है।

कई मामलों में Admission में ही महीनों लग जाते हैं और Resolution Process को 900 दिनों से ज्यादा समय लग जाता है।

मार्च 2026 तक NCLT में 1,885 Insolvency Cases लंबित थे और इनमें करीब तीन-चौथाई मामले 330 दिनों की निर्धारित समय-सीमा पार कर चुके थे।

तो क्या Bad Loans खत्म हो गए हैं?

यही इस पूरे मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है:

**क्या Bad Loans वास्तव में खत्म हो गए हैं—या वे सिर्फ Banks की Balance Sheet से निकलकर Public Ledger में चले गए हैं?**

Net NPA में कमी निश्चित रूप से सकारात्मक है। लेकिन असली सफलता तब मानी जाएगी जब Write-off किए गए Loans से वास्तविक Cash Recovery भी तेजी से बढ़े।

क्योंकि आखिरकार **Write-off और Recovery के बीच जो अंतर है, उसकी कीमत किसी न किसी रूप में जनता और अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ती है।**

इसीलिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि बैंक का Net NPA कितना है।

हमें यह भी देखना चाहिए:

कितना Loan Write-off हुआ?

कितना पैसा वास्तव में Recover हुआ?

Recovery में कितना समय लगा?

और आखिरकार इस पूरी प्रक्रिया की लागत कौन उठा रहा है?**

Net NPA का कम होना अच्छी खबर है, लेकिन असली “NPA Miracle” तभी माना जाएगा जब Bad Loans की Recovery भी मजबूत, तेज और पारदर्शी हो।

आम Bank Customer को क्या समझना चाहिए?

दोस्तों, इस पूरी चर्चा से आम बैंक ग्राहक और निवेशक के लिए तीन महत्वपूर्ण बातें निकलती हैं।

### पहली बात

**कम NPA निश्चित रूप से अच्छी खबर है।**

इसका मतलब Banking Sector की Asset Quality में सुधार हुआ है।

### दूसरी बात

**Write-off को Loan Recovery का पर्याय नहीं समझना चाहिए।**

Write-off Accounting का एक हिस्सा है।

असल सफलता तब है जब पैसा वास्तव में वापस आए।

### तीसरी बात

**Recovery की Speed बहुत महत्वपूर्ण है।**

₹100 आज Recover होना और ₹100 कई साल बाद Recover होना—दोनों की आर्थिक कीमत समान नहीं होती।

समय बढ़ने के साथ Opportunity Cost, Legal Cost और अन्य खर्च भी बढ़ सकते हैं।

# अंतिम सवाल

तो दोस्तों,

आज भारत के Banking Sector के सामने एक तरफ एक अच्छी खबर है—

**Net NPA 1% से नीचे।**

लेकिन दूसरी तरफ एक बड़ा सवाल भी है—

**पिछले 11 वर्षों में ₹19 लाख करोड़ के Loans Write-off होने के बाद वास्तविक Recovery कितनी हुई?**

अगर 2024-25 में Recovery Rate करीब 35% रही, तो हमें यह सवाल पूछना ही चाहिए कि बाकी रकम की Recovery कैसे और कब होगी?

और यही हमें उस महत्वपूर्ण सवाल तक ले जाता है—

**क्या Bad Loans वास्तव में खत्म हो गए हैं, या उनका कुछ हिस्सा सिर्फ Bank Balance Sheet से बाहर चला गया है?**

मेरी नजर में इस पूरे मुद्दे को समझने का सही तरीका है—

**NPA कम होना अच्छी खबर है।

लेकिन Recovery बढ़ना उससे भी बड़ी खबर है।**

क्योंकि अंततः बैंक की मजबूती सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि कितने खराब Loans दिखाई दे रहे हैं।

बल्कि इस बात से भी तय होती है कि—

**कितना पैसा वापस आया, कितनी जल्दी आया और किस कीमत पर आया।**

# **Net NPA 1% से नीचे… लेकिन ₹19 लाख करोड़ का सवाल! आखिर बैंक का पैसा कहां गया?**

खुशी की बात यह है कि आज बैंकों का **Net NPA 1% से नीचे** आ गया है।

लेकिन सवाल यह है—

**अगर बैंकों की स्थिति इतनी अच्छी है, तो पिछले 11 वर्षों में करीब ₹19 लाख करोड़ के Loans Write-off क्यों किए गए?

और उससे भी बड़ा सवाल—

**इन Write-off किए गए Loans में से वास्तव में कितना पैसा वापस आया?**

यही सवाल Shankar Aiyar ने अपने हालिया कॉलम में उठाया है।

आइए इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं।

## पहला सवाल—₹19 लाख करोड़ का Write-off आखिर है क्या?

सबसे पहले एक बहुत महत्वपूर्ण बात।

जब हम सुनते हैं कि बैंक ने किसी Loan को Write-off कर दिया, तो आम आदमी अक्सर समझता है कि बैंक ने उस कर्ज को माफ कर दिया।

लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है।

**Write-off का मतलब यह नहीं कि Recovery की कोशिश खत्म हो गई।**

इसका मतलब मुख्य रूप से यह है कि बैंक ने उस खराब Loan को अपनी नियमित Accounting में अलग तरीके से दर्ज किया है और उसके खिलाफ जरूरी Provision या Accounting Adjustment किया है।

लेकिन Recovery की प्रक्रिया आगे भी चल सकती है।

अब असली सवाल है—

Recovery कितनी हुई?

# ₹100 के Loan में सिर्फ ₹35 वापस!

दिए गए आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष **2024-25 में Write-off किए गए Loans की Recovery Rate करीब 35% रही।

यानी आसान भाषा में समझिए—

अगर बैंक ने **₹100 का Loan Write-off किया**, तो उसमें से औसतन सिर्फ **₹35 की Recovery** हुई।

बाकी **₹65 की Recovery नहीं हो सकी।**

यह आंकड़ा हमें बताता है कि केवल Write-off की राशि देखकर पूरी तस्वीर समझ में नहीं आती।

हमें Recovery भी देखनी होगी।

# पिछले 5 वर्षों का आंकड़ा और भी महत्वपूर्ण

अब जरा पिछले पांच वर्षों की तस्वीर देखिए।

करीब **₹9.23 लाख करोड़ के Loans Write-off किए गए।**

लेकिन इनमें से सिर्फ **₹2.10 लाख करोड़** की Recovery हो सकी।

यानी Write-off की गई बड़ी रकम की तुलना में वास्तविक Recovery काफी कम रही।

इसलिए सवाल उठना स्वाभाविक है—

**क्या Loan को Balance Sheet से हटाना और पैसा वापस पाना—दो अलग-अलग बातें हैं?**

जी हां।

और यही इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

# Net NPA 1% से नीचे—तो फिर चिंता क्यों?

अब आते हैं उस आंकड़े पर जिस पर Banking Sector को गर्व होना चाहिए।

**Net NPA 1% से नीचे है।**

इसका मतलब है कि बैंकों की Asset Quality में काफी सुधार हुआ है।

यह अच्छी खबर है।

लेकिन यहां हमें दो चीजों को अलग-अलग समझना होगा—

**Net NPA और Cash Recovery।**

दोनों एक ही चीज नहीं हैं।

मान लीजिए किसी बैंक के खराब Loan को Accounting और Provisioning के जरिए Balance Sheet पर अलग तरीके से दिखाया गया।

इससे बैंक का reported NPA कम दिखाई दे सकता है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बैंक को पूरा पैसा Cash में वापस मिल चुका है।

इसलिए—

**कम Net NPA = अच्छी खबर**

लेकिन

**कम Net NPA = हर खराब Loan की पूरी Recovery हो गई**

यह मान लेना सही नहीं होगा।

 2,104 Wilful Defaulters पर ₹1.77 लाख करोड़

अब एक और बड़ा आंकड़ा देखिए।

जून 2025 तक Public Sector Banks यानी PSBs ने **2,104 Wilful Defaulters** के बारे में रिपोर्ट किया था।

इन पर करीब **₹1.77 लाख करोड़** की राशि बकाया बताई गई।

Wilful Default का मामला सामान्य Loan Default से अलग होता है।

इसमें यह सवाल उठता है कि क्या Borrower के पास भुगतान करने की क्षमता या संसाधन होते हुए भी उसने जानबूझकर Loan की repayment नहीं की।

इसलिए ऐसे मामलों में Recovery और Accountability दोनों बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

IBC आया था तेज Recovery के लिए

अब बात करते हैं **Insolvency and Bankruptcy Code यानी IBC** की।

IBC आने के पीछे एक बड़ा उद्देश्य था—

**Bad Loans की Recovery को तेज करना।**

कानून में Insolvency Application को Admission के लिए लगभग **14 दिनों** की समय-सीमा का प्रावधान है और Resolution Process के लिए सामान्यतः **330 दिनों** का लक्ष्य रखा गया है।

सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है।

लेकिन जमीन पर क्या होता है?

कई मामलों में Admission में ही महीनों लग जाते हैं।

और Resolution Process कई मामलों में **900 दिनों से ज्यादा** खिंच जाता है।

यानी जो प्रक्रिया लगभग एक साल के अंदर पूरी होनी चाहिए थी, वह कई मामलों में ढाई साल से भी ज्यादा समय ले रही है।

NCLT में 1,885 मामले लंबित

मार्च 2026 तक **NCLT में 1,885 Insolvency Cases लंबित** बताए गए।

और इनमें लगभग तीन-चौथाई मामले निर्धारित **330 दिनों की सीमा पार कर चुके थे।**

अब आप सोचिए—

अगर Recovery Process ही लंबी होती चली जाए, तो बैंक को पैसा कब मिलेगा?

और जब पैसा देर से मिलेगा, तो उसकी आर्थिक कीमत कौन चुकाएगा?

यही सवाल बहुत महत्वपूर्ण है।

# क्या Bad Loans वास्तव में गायब हो गए?

अब आते हैं इस पूरी कहानी के सबसे बड़े सवाल पर।

**क्या भारत में Bad Loans की समस्या खत्म हो गई है?**

या फिर—

**क्या Bad Loans का एक हिस्सा Bank Balance Sheet से हटकर किसी दूसरे रूप में दिखाई दे रहा है?**

Net NPA में गिरावट निश्चित रूप से अच्छी खबर है।

इसका मतलब है कि Banking Sector की स्थिति पहले के मुकाबले मजबूत हुई है।

लेकिन Banking Sector की वास्तविक मजबूती को केवल एक आंकड़े से नहीं मापा जा सकता।

हमें चार चीजें साथ-साथ देखनी होंगी—

**कितना Loan दिया गया?**

**कितना Loan खराब हुआ?**

**कितना Write-off हुआ?**

और सबसे महत्वपूर्ण—

**कितना पैसा वास्तव में वापस आया?**

# आखिर कीमत कौन चुकाता है?

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल—**Citizen Janardhan यानी आम नागरिक की इसमें क्या भूमिका है?**

जब बैंक को किसी Loan की पूरी Recovery नहीं होती, तो उसका आर्थिक असर केवल बैंक तक सीमित नहीं रहता।

Banking System अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बैंकों की Balance Sheet, Capital Requirement, Provisioning और अंततः Banking System की मजबूती का संबंध व्यापक अर्थव्यवस्था से है।

इसलिए Write-off और Recovery के बीच जितना बड़ा अंतर होगा, उतना ही बड़ा सवाल उठेगा—

**इस अंतर की कीमत आखिर कौन उठा रहा है?**

यही कारण है कि हमें केवल यह सुनकर संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए कि—

**“Net NPA 1% से नीचे आ गया।”**

हमें आगे पूछना चाहिए—

**“Recovery कितनी हुई?”**

आम Bank Customer को क्या समझना चाहिए?

दोस्तों, इस पूरी चर्चा से आम बैंक ग्राहक और निवेशक के लिए तीन महत्वपूर्ण बातें निकलती हैं।

 पहली बात

**कम NPA निश्चित रूप से अच्छी खबर है।**

इसका मतलब Banking Sector की Asset Quality में सुधार हुआ है।

दूसरी बात

Write-off को Loan Recovery का पर्याय नहीं समझना चाहिए।

Write-off Accounting का एक हिस्सा है।

असल सफलता तब है जब पैसा वास्तव में वापस आए।

 तीसरी बात

Recovery की Speed बहुत महत्वपूर्ण है।**

₹100 आज Recover होना और ₹100 कई साल बाद Recover होना—दोनों की आर्थिक कीमत समान नहीं होती।

समय बढ़ने के साथ Opportunity Cost, Legal Cost और अन्य खर्च भी बढ़ सकते हैं।

अंतिम सवाल

तो दोस्तों,

आज भारत के Banking Sector के सामने एक तरफ एक अच्छी खबर है—

**Net NPA 1% से नीचे।**

लेकिन दूसरी तरफ एक बड़ा सवाल भी है—

**पिछले 11 वर्षों में ₹19 लाख करोड़ के Loans Write-off होने के बाद वास्तविक Recovery कितनी हुई?**

अगर 2024-25 में Recovery Rate करीब 35% रही, तो हमें यह सवाल पूछना ही चाहिए कि बाकी रकम की Recovery कैसे और कब होगी?

और यही हमें उस महत्वपूर्ण सवाल तक ले जाता है—

**क्या Bad Loans वास्तव में खत्म हो गए हैं, या उनका कुछ हिस्सा सिर्फ Bank Balance Sheet से बाहर चला गया है?**

मेरी नजर में इस पूरे मुद्दे को समझने का सही तरीका है—

**NPA कम होना अच्छी खबर है।

लेकिन Recovery बढ़ना उससे भी बड़ी खबर है।**

क्योंकि अंततः बैंक की मजबूती सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि कितने खराब Loans दिखाई दे रहे हैं।

बल्कि इस बात से भी तय होती है कि—

**कितना पैसा वापस आया, कितनी जल्दी आया और किस कीमत पर आया।**

अगर आपको यह जानकारी उपयोगी लगी हो तो वीडियो को Like करें, Share करें और **BeYourMoneyManager** चैनल को Subscribe जरूर करें। 

याद रखिए—

**आपका पैसा, आपकी मेहनत की कमाई है।

इसे समझदारी से संभालिए।**




Rajanish Kant बुधवार, 2 सितंबर 2026
NPS के नए नियम 2026: PFRDA ने स्कीम्स को 5 कैटेगरी में बांटा, अब स्कीम चुनना हुआ आसान| beyourmoneymanager
NPS के संशोधित नियम: PFRDA ने स्कीम्स को पांच श्रेणियों में बांटा, सब्सक्राइबर्स के लिए स्कीम सेलेक्शन आसान बना

राष्ट्रीय पेंशन सिस्टम (NPS) के सब्सक्राइबर्स के लिए अच्छी खबर है। पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (PFRDA) ने 28 अगस्त 2026 के सर्कुलर के जरिए NPS स्कीम्स के वर्गीकरण और प्रेजेंटेशन को नया रूप दिया है। अब स्कीम्स को पांच मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है, जिससे निवेशकों के लिए सही स्कीम चुनना पहले से कहीं ज्यादा आसान और पारदर्शी हो जाएगा।

ये बदलाव मुख्य रूप से स्कीम के नामकरण, जोखिम स्तर और इक्विटी एक्सपोजर को स्टैंडर्ड बनाने पर आधारित हैं। इससे सब्सक्राइबर्स आसानी से रिटर्न, चार्जेस, रिस्क और एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) की तुलना कर सकेंगे।

NPS स्कीम्स की पांच मुख्य श्रेणियां क्या हैं?

PFRDA के नए फ्रेमवर्क के अनुसार NPS स्कीम्स अब इन पांच ब्रॉड कैटेगरी में आएंगी:

लाइफसाइकल-बेस्ड स्कीम्स  

एक्टिव चॉइस  

NPS संचय  

मल्टीपल स्कीम फ्रेमवर्क (MSF)  

4A स्कीम्स (क्यूरेटेड/थीमेटिक स्कीम्स जैसे NPS वात्सल्य, NPS स्वास्थ्य आदि)

लाइफसाइकल स्कीम्स का नया वर्गीकरण

लाइफसाइकल स्कीम्स को इक्विटी एक्सपोजर के आधार पर आगे बांटा गया है। इनमें आवंटन उम्र के साथ अपने-आप बदलता रहता है:

लाइफ साइकिल एग्रेसिव  

लाइफ साइकिल 75 – हाई  

लाइफ साइकिल 50 – मॉडरेट  

लाइफ साइकिल 25 – लो  

ये स्कीम्स उम्र के हिसाब से इक्विटी, कॉरपोरेट बॉन्ड और सरकारी सिक्योरिटीज में आवंटन एडजस्ट करती हैं।

MSF स्कीम्स की पांच रिस्क कैटेगरी

सबसे बड़ा बदलाव MSF स्कीम्स में है। इन्हें इक्विटी एक्सपोजर के आधार पर पांच स्पष्ट श्रेणियों में रखा गया है:

| कैटेगरी | कोड | रिस्क लेवल          | इक्विटी एक्सपोजर   |

|---------|-----|---------------------|--------------------|

| एग्रेसिव ग्रोथ | A   | बहुत हाई रिस्क     | 80%–100%          |

| हाई ग्रोथ    | B   | हाई रिस्क          | 60%–80%           |

| बैलेंस्ड ग्रोथ | C   | मीडियम रिस्क       | 35%–60%           |

| कंजरवेटिव   | D   | लो रिस्क           | 10%–35%           |

| डेट         | E   | बहुत लो रिस्क      | 0%–10%            |

अब हर स्कीम का नाम स्टैंडर्ड फॉर्मेट में होगा – पेंशन फंड का नाम + “NPS” + कैटेगरी कोड + स्कीम नाम। इससे रिस्क लेवल तुरंत समझ में आ जाएगा।

एक्टिव चॉइस और NPS संचय में बदलाव

एक्टिव चॉइस** में इक्विटी का अधिकतम आवंटन 75% तक (टियर-II में 100% तक) हो सकता है।  

NPS संचय** में इक्विटी 5% से 65% तक सीमित रहेगी।

सब्सक्राइबर्स के लिए क्या फायदा?

नए नियमों से स्कीम सेलेक्शन का प्रोसेस स्टैंडर्ड हो गया है। CRA प्लेटफॉर्म और अन्य चैनल्स पर अब इस क्रम में विकल्प दिखेंगे:

स्कीम का प्रकार  

कैटेगरी / एसेट एलोकेशन  

पेंशन फंड का चयन  

हर स्कीम पर ये जानकारी साफ-साफ दिखेगी –  

स्कीम नाम  

पेंशन फंड  

लॉन्च डेट  

हिस्टोरिकल रिटर्न  

बेंचमार्क  

चार्जेस  

रिस्कोमीटर  

AUM  

इससे तुलना करना आसान हो जाएगा। सब्सक्राइबर एक PRAN के तहत कई MSF स्कीम्स रख सकते हैं, लेकिन लाइफसाइकल या एक्टिव चॉइस में से एक ही चुन सकते हैं। स्कीम या पेंशन फंड बदलने के नियम भी स्पष्ट किए गए हैं।


आपको क्या करना चाहिए?


अगर आप पहले से NPS में निवेश कर रहे हैं तो घबराने की जरूरत नहीं। मौजूदा निवेश तुरंत स्विच नहीं करना पड़ेगा। पेंशन फंड्स को 30-45 दिनों में नाम बदलने और कैटेगरी अलाइन करने का समय दिया गया है। नए निवेश करने से पहले नई कैटेगरी, रिस्क लेवल और रिटर्न की तुलना जरूर करें।

निष्कर्ष:  

PFRDA का ये कदम NPS को और अधिक यूजर-फ्रेंडली और पारदर्शी बनाता है। अब रिटायरमेंट प्लानिंग करते समय रिस्क और रिटर्न को बेहतर तरीके से समझकर सही स्कीम चुनना आसान हो गया है। अपनी उम्र, रिस्क लेने की क्षमता और फाइनेंशियल गोल्स के हिसाब से स्कीम चुनें।

अधिक जानकारी और व्यक्तिगत सलाह के लिए www.beyourmoneymanager.com पर विजिट करें या अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से बात करें।

(नोट: यह आर्टिकल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। निवेश से पहले आधिकारिक PFRDA सर्कुलर और नवीनतम अपडेट जरूर चेक करें।)

Rajanish Kant
बीमारी या मृत्यु से पहले परिवार के लिए जरूरी 10 दस्तावेज और जानकारी – अभी तैयार रखें

 


बीमारी या अचानक मृत्यु की स्थिति में परिवार को चाहिए ये 10 जरूरी दस्तावेज और डिटेल्स

कोई भी व्यक्ति बीमारी, दुर्घटना या अचानक स्वास्थ्य समस्या की उम्मीद नहीं करता। लेकिन जब ऐसी स्थिति आती है, तो वे परिवार सबसे बेहतर तरीके से संभाल पाते हैं, जिन्होंने पहले से अपने कागजात व्यवस्थित कर रखे होते हैं। स्वस्थ रहते हुए अपनी व्यवस्था ठीक कर लेना बुरी घटना की उम्मीद नहीं, बल्कि अपने प्रियजनों को अनुमान, खोजबीन और अनावश्यक परेशानी से बचाना है।

यहां वे 10 महत्वपूर्ण दस्तावेज और जानकारियां दी गई हैं, जो हर व्यक्ति को अपने परिवार के लिए पहले से तैयार रखनी चाहिए:

1. वसीयत (Will), फाइनेंशियल पावर ऑफ अटॉर्नी और लिविंग ट्रस्ट

वसीयत तय करती है कि आपकी संपत्ति, पैसा और सामान किसे मिलेगा। बिना वसीयत के राज्य के कानून तय करेंगे, न कि आपका परिवार।  

ड्यूरेबल पावर ऑफ अटॉर्नी फॉर फाइनेंस किसी विश्वसनीय व्यक्ति को आपके पैसे का प्रबंधन करने का अधिकार देता है, जब आप खुद ऐसा करने में असमर्थ हों।  

लिविंग ट्रस्ट और आगे बढ़कर संपत्ति को ट्रस्टी के माध्यम से व्यवस्थित करता है। इन तीन दस्तावेजों के बिना परिवार को कानूनी उलझनों का सामना करना पड़ सकता है।

2. एडवांस डायरेक्टिव्स – लिविंग विल और हेल्थकेयर पावर ऑफ अटॉर्नी

अगर आप खुद अपनी चिकित्सा इच्छाएं बताने में असमर्थ हों, तो लिविंग विल बताती है कि आप कौन-से इलाज चाहते हैं और कौन-से नहीं।  

ड्यूरेबल पावर ऑफ अटॉर्नी फॉर हेल्थकेयर किसी व्यक्ति को आपकी जगह चिकित्सा निर्णय लेने का अधिकार देता है। ये दस्तावेज परिवार को कठिन फैसलों से बचाते हैं।

3. सही हेल्थकेयर प्रॉक्सी चुनना

प्रॉक्सी सिर्फ नाम नहीं होता। वह व्यक्ति अस्पताल में आपके मूल्यों के अनुसार फैसला लेगा। सबसे नजदीकी रिश्तेदार हमेशा सही विकल्प नहीं होता। वह व्यक्ति चुनें जो आपके मूल्यों को जानता हो, दबाव में शांत रहे और आपके इच्छाओं का सम्मान करे।

4. दस्तावेज एक सुरक्षित जगह पर रखें

सभी जरूरी कागजात एक फाइल, लेबल वाले ड्रॉअर या नोटबुक में रखें। फायरप्रूफ और वॉटरप्रूफ सेफ में मूल दस्तावेज रखना बेहतर है। बैंक लॉकर में रखे दस्तावेजों की कॉपी घर पर भी रखें, क्योंकि आपातकाल में लॉकर तुरंत उपलब्ध नहीं हो सकता।

5. किसी विश्वसनीय व्यक्ति को बताएं कि दस्तावेज कहां हैं

बिल्कुल व्यवस्थित फाइल भी बेकार है अगर कोई नहीं जानता कि वह कहां है। कम से कम एक विश्वसनीय व्यक्ति (परिवार का सदस्य, करीबी मित्र या वकील) को दस्तावेजों की जगह पता होनी चाहिए।

6. व्यक्तिगत जानकारी की लिस्ट तैयार रखें

पूर्ण कानूनी नाम, आधार/पैन नंबर, जन्म व विवाह प्रमाणपत्र, रोजगार इतिहास, डॉक्टर, वकील और वित्तीय सलाहकार के संपर्क नंबर। ये छोटी-छोटी जानकारियां परिवार को हफ्तों की खोज से बचाती हैं।

7. बैंक खाते, कर्ज और बीमा पॉलिसियों का रिकॉर्ड

सभी बैंक व निवेश खातों के नंबर, बीमा पॉलिसी डिटेल्स (एजेंट के संपर्क सहित), हालिया टैक्स रिटर्न की कॉपी और कर्ज की लिस्ट तैयार रखें। बिना इसके परिवार भुगतान चूक सकता है या संपत्ति का पता नहीं लगा पाता।

8. डॉक्टर से एडवांस केयर प्लानिंग पर बात करें

डॉक्टर से अपनी चिकित्सा इच्छाओं पर चर्चा करें। यह बातचीत अक्सर मुफ्त या बीमा के तहत कवर होती है। डॉक्टर आपको विकल्प समझा सकते हैं और परिवार को बाद में झगड़ों से बचा सकते हैं।

9. डिजिटल और ऑनलाइन खातों की जानकारी

बैंक, निवेश, ईमेल, सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन अकाउंट्स के लॉगिन डिटेल्स (सुरक्षित तरीके से) नोट करें, ताकि जरूरत पड़ने पर परिवार पहुंच सके।

10. योजना को नियमित रूप से अपडेट करें

एक बार बनाई योजना हमेशा के लिए नहीं होती। तलाक, नया बच्चा, स्थान परिवर्तन या स्वास्थ्य में बड़ा बदलाव योजना को पुराना बना सकता है। साल में कम से कम एक बार या किसी बड़े जीवन परिवर्तन के बाद दस्तावेजों की समीक्षा और अपडेट जरूर करें।

निष्कर्ष

ये दस्तावेज और जानकारियां तैयार रखना आपके परिवार के प्रति सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। आज ही एक फाइल बनाएं, जरूरी कागजात इकट्ठा करें और कम से कम एक व्यक्ति को बताएं।  

BeYourMoneyManager.com पर हम आपको वित्तीय योजना, टैक्स, निवेश और परिवार की सुरक्षा से जुड़े व्यावहारिक सुझाव देते रहते हैं। अपनी और अपने परिवार की आर्थिक सुरक्षा के लिए नियमित रूप से हमारी वेबसाइट विजिट करते रहें।

नोट: कानूनी दस्तावेज बनाने के लिए योग्य वकील या विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है।

(Ctsy: ET Wealth) 

Rajanish Kant मंगलवार, 1 सितंबर 2026
Income Tax का बड़ा रिकॉर्ड: AY 2026-27 के लिए 31 अगस्त तक 7.8 करोड़ से अधिक ITR दाखिल, करदाताओं को धन्यवाद

आयकर विभाग का ऐतिहासिक उपलब्धि: AY 2026-27 के लिए 7.8 करोड़ से अधिक ITR दाखिल

नई दिल्ली, 1 सितंबर 2026: आयकर विभाग ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, Assessment Year (AY) 2026-27, FYb(2025-2026) के लिए 31 अगस्त 2026 तक 7.8 करोड़ से अधिक Income Tax Returns (ITR) दाखिल किए गए हैं। यह आंकड़ा पिछले वर्षों की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाता है और करदाताओं तथा पेशेवरों के समय पर अनुपालन को दर्शाता है।

आयकर विभाग के आधिकारिक हैंडल @IncomeTaxIndia ने इस उपलब्धि की घोषणा करते हुए कहा कि उन्होंने करदाताओं और टैक्स प्रोफेशनल्स का दिल से आभार व्यक्त किया है। विभाग ने समय पर रिटर्न फाइल करने के लिए सभी को धन्यवाद दिया और आगे भी अनुपालन बनाए रखने की अपील की।

क्यों महत्वपूर्ण है यह रिकॉर्ड?

समय पर ITR फाइल करने से करदाताओं को रिफंड जल्दी मिलने, नोटिस से बचने और कानूनी जटिलताओं से मुक्ति मिलती है।

विभाग ने ITR-1 और ITR-2 के लिए 31 जुलाई तथा अन्य फॉर्म के लिए 31 अगस्त की समय सीमा तय करके पोर्टल पर लोड को कम करने का प्रयास किया, जिससे प्रक्रिया सुचारू रही।

अधिक संख्या में रिटर्न दाखिल होने से कर प्रशासन मजबूत होता है और देश की अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ती है।

करदाताओं के लिए सुझाव

यदि आपने अभी तक अपना ITR नहीं दाखिल किया है तो जल्द से जल्द www.incometax.gov.in पोर्टल पर जाकर फाइल करें। सही जानकारी भरें, आवश्यक दस्तावेज तैयार रखें और देर न करें। देर से फाइल करने पर लेट फीस और अन्य दंड लग सकते हैं।

BeYourMoneyManager.com पर हम आपको टैक्स प्लानिंग, ITR फाइलिंग टिप्स, रिफंड ट्रैकिंग और वित्तीय प्रबंधन से जुड़ी विश्वसनीय जानकारी नियमित रूप से उपलब्ध कराते हैं। टैक्स संबंधी अपडेट्स और स्मार्ट मनी टिप्स के लिए हमारी वेबसाइट को नियमित रूप से चेक करते रहें।

स्रोत: Income Tax Department, Government of India  ... अधिक जानकारी के लिए: incometax.gov.in


Rajanish Kant
सोना ने अमेरिकी डॉलर को पीछे छोड़ा: दुनिया का सबसे बड़ा रिजर्व एसेट बना गोल्ड | सेंट्रल बैंकों का बड़ा संदेश | आम निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है?

सोना अब दुनिया का सबसे बड़ा ग्लोबल रिजर्व एसेट बन चुका है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, गोल्ड ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स को पीछे छोड़ते हुए केंद्रीय बैंकों के आधिकारिक रिजर्व में सबसे बड़ा हिस्सा हासिल कर लिया है। यह बदलाव वैश्विक मौद्रिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मोड़ को दर्शाता है।

यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 के अंत तक गोल्ड का हिस्सा कुल आधिकारिक रिजर्व में लगभग 27 प्रतिशत तक पहुंच गया, जबकि अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स का हिस्सा घटकर 22 प्रतिशत रह गया। यूरो का हिस्सा करीब 15 प्रतिशत पर बना रहा। हालांकि डॉलर-आधारित संपत्तियां कुल मिलाकर अभी भी बड़ा हिस्सा रखती हैं, लेकिन एकल एसेट के रूप में सोना सबसे आगे निकल गया है।

क्यों हो रहा है यह बदलाव?

केंद्रीय बैंक पिछले कई वर्षों से लगातार सोना खरीद रहे हैं। भू-राजनीतिक तनाव, प्रतिबंधों का खतरा, बढ़ता अमेरिकी कर्ज और मुद्रास्फीति की चिंताएं इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही हैं। पोलैंड, कजाकिस्तान, ब्राजील, चीन और तुर्की जैसे देशों ने सक्रिय रूप से गोल्ड रिजर्व बढ़ाया है।

गोल्ड की कीमतों में तेज उछाल ने भी इसकी हिस्सेदारी बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है। कीमतों में वृद्धि से मौजूदा होल्डिंग्स का मूल्य स्वतः बढ़ गया, जिससे सोना रिजर्व में टॉप पोजीशन पर पहुंच गया। कई विशेषज्ञ इसे सिर्फ वैल्यूएशन इफेक्ट नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक बदलाव मानते हैं। सेंट्रल बैंक सोने को “रियल मनी” के रूप में देख रहे हैं—ऐसी संपत्ति जो किसी एक देश की नीतियों या प्रतिबंधों से प्रभावित नहीं होती।

ग्लोबल मौद्रिक सिस्टम में शिफ्ट

दशकों तक अमेरिकी डॉलर और ट्रेजरी बॉन्ड्स वैश्विक रिजर्व का मुख्य आधार रहे। अब केंद्रीय बैंक विविधता लाने और जोखिम कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के सर्वेक्षणों में अधिकांश रिजर्व मैनेजर यह उम्मीद जताते हैं कि आने वाले वर्षों में गोल्ड होल्डिंग्स और बढ़ेंगी, जबकि डॉलर की हिस्सेदारी घटेगी।

यह ट्रेंड बताता है कि “असली पैसा” फिर से महत्व पा रहा है। सोना न तो प्रिंट किया जा सकता है और न ही आसानी से फ्रीज किया जा सकता है। यही वजह है कि कई देश इसे सुरक्षित और तटस्थ रिजर्व एसेट के रूप में अपना रहे हैं।

आम निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है?

यह घटना सिर्फ केंद्रीय बैंकों तक सीमित नहीं है। सोने की मजबूत मांग और रिजर्व स्टेटस में बढ़ोतरी लंबे समय में इसकी कीमतों को सपोर्ट कर सकती है। भारतीय निवेशकों के लिए भी यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में सोना पारंपरिक रूप से सुरक्षित निवेश माना जाता है।

हालांकि याद रखें कि सोने की कीमतें अस्थिर हो सकती हैं और यह कोई ब्याज नहीं देता। पोर्टफोलियो में संतुलन बनाए रखना जरूरी है। दीर्घकालिक निवेशकों के लिए गोल्ड ETF, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड या फिजिकल गोल्ड जैसे विकल्प उपलब्ध हैं।

वैश्विक मौद्रिक व्यवस्था में यह बदलाव साफ संकेत देता है कि सेंट्रल बैंक “रियल मनी” यानी सोने की ओर लौट रहे हैं। यह ट्रेंड जारी रहता है तो आने वाले वर्षों में गोल्ड की भूमिका और मजबूत हो सकती है।

(नोट: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श अवश्य लें।)


Rajanish Kant रविवार, 30 अगस्त 2026
सोना $5,400 तक जाएगा? UBS का बड़ा अनुमान, डी-डॉलराइजेशन से Gold में तेजी के संकेत | Gold Price Forecast 2026-27

UBS ने सोने की कीमत अगले 12 महीनों में $5,400 प्रति औंस तक पहुंचने का अनुमान लगाया है। जानिए डी-डॉलराइजेशन, अमेरिकी कर्ज, डॉलर की कमजोरी और Central Bank Gold Buying से भारतीय निवेशकों पर क्या असर पड़ेगा।

# सोना $5,400 तक जाएगा? UBS का बड़ा अनुमान, डी-डॉलराइजेशन से Gold में तेजी के संकेत

**सोने में निवेश करने वालों के लिए एक बार फिर बड़ी खबर सामने आई है।** दुनिया के प्रमुख वित्तीय संस्थानों में शामिल UBS का मानना है कि अमेरिकी डॉलर से दुनिया के देशों का धीरे-धीरे दूरी बनाना यानी **De-dollarization** सोने की कीमतों के लिए बड़ा सपोर्ट बन सकता है। UBS ने अगले 12 महीनों में सोने की कीमत करीब **$5,400 प्रति औंस** तक पहुंचने का अनुमान जताया है।

यह अनुमान ऐसे समय आया है जब सोना पहले ही 2026 में जोरदार तेजी दिखा चुका है और अगस्त महीने में इसकी कीमत में लगभग 15% की बढ़त दर्ज की गई थी। हालांकि, हाल की गिरावट ने यह भी दिखाया है कि सोने की राह सीधी नहीं रहने वाली है। 

 UBS को सोने में इतनी तेजी क्यों दिख रही है?

UBS के मुताबिक सोने को सबसे बड़ा फायदा **De-dollarization trade** से मिल सकता है। इसका मतलब है कि दुनिया के कुछ देश और केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं और सोने जैसे वैकल्पिक रिजर्व एसेट की हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं।

UBS ने बताया कि पिछले एक महीने में अमेरिकी डॉलर इंडेक्स यानी **DXY लगभग 2.4% कमजोर हुआ है**। बैंक का मानना है कि मध्यम और लंबी अवधि में अमेरिकी डॉलर पर दबाव बना रह सकता है।

इसके पीछे कई कारण हैं—

* अमेरिका की बढ़ती fiscal challenges

* सरकारी कर्ज का बड़ा आकार

* व्यापार नीति को लेकर अनिश्चितता

* अमेरिकी डॉलर में देशों के रिजर्व की हिस्सेदारी को लेकर बदलाव

* केंद्रीय बैंकों की लगातार सोने की खरीद

इन सभी कारणों का फायदा सोने को मिल सकता है।

## अमेरिकी कर्ज बना सोने के लिए बड़ा मुद्दा

सोने की मौजूदा तेजी को केवल महंगाई या ब्याज दरों से समझना पर्याप्त नहीं है। अब अमेरिका की fiscal position भी निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण विषय बनती जा रही है।

जब किसी देश के सरकारी कर्ज और fiscal deficit को लेकर चिंता बढ़ती है, तो निवेशक अपने पोर्टफोलियो में ऐसे assets की तलाश करते हैं जिन्हें किसी एक सरकार या मुद्रा पर निर्भर न माना जाए।

सोना इस मामले में एक महत्वपूर्ण विकल्प बन जाता है।

UBS का मानना है कि अमेरिका की fiscal स्थिति और डॉलर को लेकर लंबे समय की चिंताएं सोने की कीमत को आगे भी समर्थन दे सकती हैं। 

## Central Banks की Gold Buying क्यों महत्वपूर्ण है?

सोने की मौजूदा कहानी में केंद्रीय बैंकों की खरीदारी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

UBS के अनुसार 2026 की दूसरी तिमाही में केंद्रीय बैंकों ने लगभग **289 टन सोना खरीदा**। बैंक का अनुमान है कि 2026 में केंद्रीय बैंकों की कुल सोना खरीद **750 से 1,000 टन** के बीच रह सकती है। 

यह खरीदारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्रीय बैंकों की मांग आम निवेशकों की तुलना में अधिक दीर्घकालिक हो सकती है।

अगर केंद्रीय बैंक लगातार अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ाते हैं, तो बाजार में सोने के लिए एक मजबूत structural demand बन सकती है।

## चीन भी बढ़ा रहा है Gold Reserves

UBS ने चीन का उदाहरण भी दिया है।

रिपोर्ट के अनुसार जुलाई में **People’s Bank of China ने अपने Gold Reserves में 20 metric tons की बढ़ोतरी की**, जो अक्टूबर 2023 के बाद उसकी सबसे बड़ी मासिक वृद्धि थी। 

भारत सहित दुनिया के कई देशों के निवेशकों के लिए यह संकेत महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर बड़े केंद्रीय बैंक डॉलर आधारित रिजर्व को diversify करते हैं, तो लंबे समय में सोने की मांग को मजबूती मिल सकती है।

Gold ETF में भी लौट रही है निवेश मांग

सोने के लिए केवल Central Bank demand ही महत्वपूर्ण नहीं है।

UBS ने यह भी कहा है कि Gold ETFs में निवेश प्रवाह फिर से बढ़ना शुरू हुआ है। यानी institutional और financial investors की तरफ से भी सोने में निवेश की मांग लौट रही है।

जब Central Banks, ETFs और private investors—तीनों तरफ से मांग बढ़ती है, तो कीमतों को मजबूत आधार मिल सकता है।

## $5,400 Gold Price Target का क्या मतलब है?

UBS का अनुमान है कि अगले 12 महीनों में सोने की कीमत **$5,400 प्रति औंस** तक पहुंच सकती है। ([Kitco][1])

लेकिन यहां भारतीय निवेशकों के लिए एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत डॉलर में तय होती है। भारत में सोने का भाव केवल अंतरराष्ट्रीय Gold Price पर निर्भर नहीं करता। इसके साथ—

**Dollar-Rupee exchange rate + Import costs + Taxes/Duties + Domestic demand + Local premium** भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इसलिए अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना तेजी दिखाता है और इसी दौरान रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो भारत में सोने की कीमत पर दोहरा प्रभाव पड़ सकता है।

## क्या इसका मतलब अभी सोना खरीद लेना चाहिए?

यहां निवेशकों को सावधानी बरतनी चाहिए।

UBS का $5,400 का अनुमान एक **forecast है, guarantee नहीं**।

सोने की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव संभव है। हाल ही में अमेरिकी Federal Reserve की ब्याज दरों को लेकर बढ़ती चिंताओं के कारण सोने और चांदी में तेज गिरावट भी देखने को मिली। 28 अगस्त को अमेरिकी फेड चेयर के महंगाई संबंधी संकेतों के बाद Spot Gold में 3% से ज्यादा की गिरावट आई। 

इससे साफ है कि Gold का long-term bullish story मजबूत हो सकती है, लेकिन short-term में volatility काफी ज्यादा रह सकती है।

भारतीय निवेशकों को क्या सीखना चाहिए?

भारतीय निवेशकों के लिए इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा $5,400 का आंकड़ा नहीं बल्कि **portfolio diversification** है।

अगर किसी निवेशक के पास पहले से ही पर्याप्त Gold exposure है, तो केवल किसी international forecast को देखकर अचानक बहुत बड़ी रकम लगाना उचित नहीं होगा।

वहीं जिन निवेशकों के portfolio में Gold बिल्कुल नहीं है, वे अपनी financial goals, risk profile और overall asset allocation के आधार पर सीमित exposure पर विचार कर सकते हैं।

सोने को केवल तेजी से पैसा बनाने वाले asset के रूप में देखने के बजाय इसे **portfolio diversification और risk hedge** के नजरिए से देखना ज्यादा उचित हो सकता है।

UBS ने भी well-diversified portfolio में gold allocation को mid-single-digit percentage के स्तर पर रखने की बात कही है। ([Kitco][1])

## Gold में निवेश के लिए तीन बड़ी बातें

### 1. De-dollarization पर नजर रखें

अगर दुनिया के केंद्रीय बैंक डॉलर से diversification जारी रखते हैं, तो सोने की structural demand को समर्थन मिल सकता है।

### 2. US Interest Rates और Real Yields को समझें

सोना ब्याज नहीं देता। इसलिए जब real yields बढ़ते हैं, तो Gold पर दबाव आ सकता है। इसके विपरीत real rates में गिरावट सोने के लिए सकारात्मक हो सकती है।

### 3. Central Bank Buying को नजरअंदाज न करें

केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी सोने के long-term demand outlook के लिए महत्वपूर्ण संकेत बन चुकी है।

## क्या $5,400 के बाद $6,000 भी संभव है?

इसका जवाब अभी निश्चित रूप से देना मुश्किल है।

UBS का मौजूदा अनुमान $5,400 प्रति औंस है, लेकिन Gold की कीमत कई variables पर निर्भर करती है—अमेरिकी डॉलर, ब्याज दरें, inflation, geopolitical risks, US fiscal situation, central-bank buying और global investment demand।

इसलिए निवेशकों को किसी एक price target को निश्चित भविष्यवाणी मानने के बजाय अलग-अलग संभावित scenarios को समझना चाहिए।

 निष्कर्ष

**Gold की कहानी अब केवल महंगाई से बचाव की कहानी नहीं रह गई है।** इसमें De-dollarization, अमेरिकी fiscal concerns, Central Bank purchases और global portfolio diversification जैसे बड़े macroeconomic trends भी शामिल हो चुके हैं।

UBS का **$5,400 प्रति औंस** का अनुमान सोने के प्रति उसके medium-term bullish outlook को दर्शाता है। लेकिन हाल की तेज गिरावट यह भी बताती है कि लंबी अवधि में सकारात्मक outlook होने के बावजूद short-term volatility से निवेशकों को सावधान रहना चाहिए। 

भारतीय निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि Gold को portfolio का एक हिस्सा मानें, पूरा portfolio नहीं।** किसी भी निवेश निर्णय से पहले अपनी financial goals, investment horizon और risk capacity को ध्यान में रखना जरूरी है।

**Disclaimer:** यह लेख उपलब्ध बाजार सूचनाओं और UBS/Kitco द्वारा प्रकाशित विश्लेषण पर आधारित है। यह किसी व्यक्ति विशेष के लिए निवेश सलाह या किसी निश्चित कीमत की गारंटी नहीं है। Gold में निवेश बाजार जोखिम के अधीन है।



Rajanish Kant
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने छोटे कर्जदारों से 74% वसूली की, बड़े डिफॉल्टर्स से सिर्फ 14.5% – RTI का चौंकाने वाला खुलासा | BeYourMoneyManager

 
क्या आप जानते हैं कि सार्वजनिक बैंक छोटे कर्जदारों से ज्यादा पैसा वसूलते हैं, जबकि बड़े डिफॉल्टर्स के हजारों करोड़ रुपये आसानी से राइट-ऑफ कर दिए जाते हैं? सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के 10 साल के RTI डेटा ने यही सच्चाई सामने ला दी है।

पूना के RTI एक्टिविस्ट विवेक वेलंकर (सजग नागरिक मंच) द्वारा मांगी गई जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2016-17 से 2025-26 तक सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने:

छोटे कर्जदार (₹1 करोड़ से कम)  

वसूली: ₹5,004 करोड़  

राइट-ऑफ: ₹6,774 करोड़  

रिकवरी रेट: लगभग 74%

बड़े कर्जदार (प्रत्येक ₹100 करोड़ से अधिक)  

वसूली: ₹3,874 करोड़  

राइट-ऑफ: ₹26,702 करोड़  

रिकवरी रेट: महज 14.5%

बैंक ने छोटे डिफॉल्टर्स से बड़े डिफॉल्टर्स की तुलना में ज्यादा राशि वसूल ली, फिर भी अमीर और बड़े कर्जदारों के लिए लगभग चार गुना ज्यादा राशि माफ कर दी। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बैंक ने इन बड़े डिफॉल्टर्स में से एक का भी नाम बताने से इनकार कर दिया।

यह दोहरा मापदंड क्यों मायने रखता है?

सार्वजनिक बैंक का पैसा आम नागरिकों का पैसा है – जमाकर्ताओं का, टैक्सपेयर्स का। जब छोटे कर्जदार (होम लोन, पर्सनल लोन, MSME) डिफॉल्ट करते हैं तो रिकवरी एजेंट, नोटिस, प्रॉपर्टी अटैचमेंट जैसी कार्रवाई तेजी से होती है। लेकिन बड़े कर्जदारों के मामले में नाम छुपाना, कम रिकवरी और बड़े राइट-ऑफ आम हो गए हैं।

यह सिर्फ एक बैंक की कहानी नहीं है। कई सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में ऐसी प्रवृत्ति देखी गई है। इससे बैंकों की बैलेंस शीट पर दबाव पड़ता है, ब्याज दरें प्रभावित हो सकती हैं और अंततः आम आदमी को महंगे लोन का सामना करना पड़ता है।

आम आदमी के लिए सबक (BeYourMoneyManager की सलाह)

लोन लेते समय सावधानी बरतें – अपनी आय के 40-50% से ज्यादा EMI न रखें। जरूरत से ज्यादा लोन लेने से बचें।  

CIBIL और क्रेडिट स्कोर मजबूत रखें – समय पर EMI भरने से न सिर्फ अच्छा स्कोर बनता है, बल्कि भविष्य में बेहतर ब्याज दर भी मिलती है।  

डॉक्यूमेंट्स और ट्रांसपेरेंसी का ध्यान रखें – लोन एग्रीमेंट, रिकवरी प्रक्रिया और अपने अधिकारों को समझें। आरबीआई के दिशानिर्देशों के तहत रिकवरी एजेंट्स के कुछ नियम होते हैं।  

विविधीकरण और इमरजेंसी फंड – सिर्फ लोन पर निर्भर न रहें। बचत, म्यूचुअल फंड और इमरजेंसी कॉर्पस बनाएं ताकि मुश्किल समय में डिफॉल्ट की स्थिति न बने।  

बड़े डिफॉल्टर्स पर नजर – सार्वजनिक धन की जवाबदेही मांगना हमारा अधिकार है। RTI और जागरूकता से पारदर्शिता बढ़ सकती है।

छोटा कर्जदार पीछा किया जाता है, बड़ा कर्जदार राइट-ऑफ हो जाता है – यही सच्चाई इस RTI ने दोहराई है। पैसे का सही प्रबंधन ही आपको सुरक्षित रखता है।

अपने पैसे को समझदारी से मैनेज करने के और टिप्स, लोन गाइड्स और निवेश सलाह के लिए www.beyourmoneymanager.com पर विजिट करें। अपने फाइनेंशियल फ्यूचर को मजबूत बनाएं!

(नोट: यह आर्टिकल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध RTI डेटा और रिपोर्ट्स पर आधारित मूल लेख है। डेटा स्रोत: सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया का RTI जवाब, MoneyLife और अन्य रिपोर्ट्स।)

Rajanish Kant शुक्रवार, 28 अगस्त 2026
सुभाष चंद्रा केस: ₹22,000 करोड़ के दावों पर सिर्फ ₹6.5 करोड़ चुकाना – पर्सनल गारंटी और डेट मैनेजमेंट की बड़ी सीख

सुभाष चंद्रा केस: ₹22,000 करोड़ के दावों पर सिर्फ ₹6.5 करोड़ – आम आदमी के लिए क्या सबक?

हाल ही में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने जी मीडिया ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा के पर्सनल इन्सॉल्वेंसी केस में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। इसके तहत चंद्रा को लगभग ₹22,006 करोड़ के एडमिटेड क्लेम्स के मुकाबले सिर्फ करीब ₹6.5 करोड़ चुकाने का प्लान मंजूर किया गया।

यह आंकड़ा सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में रहा। कई पोस्ट्स में इसे “₹15,500 करोड़ की माफी” या “सरकार द्वारा कर्ज माफ” के रूप में पेश किया गया। लेकिन हकीकत थोड़ी अलग है।

असल में क्या हुआ?

सुभाष चंद्रा ने खुद व्यक्तिगत रूप से इतना पैसा उधार नहीं लिया था। ये दावे मुख्य रूप से एस्सेल/जीईई से जुड़ी कंपनियों के कर्जों पर उनके द्वारा दी गई पर्सनल गारंटी के हैं। यानी कंपनियों ने लोन लिया, और चंद्रा ने गारंटर के तौर पर अपनी जिम्मेदारी ली।

NCLT ने उनके व्यक्तिगत एस्टेट से करीब ₹6.25 करोड़ क्रेडिटर्स को और कुछ प्रोसेस कॉस्ट के रूप में कुल ₹6.5 करोड़ का प्लान मंजूर किया। कई क्रेडिटर्स (जिनमें LIC हाउसिंग फाइनेंस आदि शामिल) ने इसका विरोध किया था, लेकिन 80% से ज्यादा वोटिंग शेयर वाले क्रेडिटर्स के समर्थन के बाद प्लान पास हो गया।

महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रिंसिपल बॉरोअर कंपनियां अभी भी अपने कर्ज के लिए जिम्मेदार हैं। ये ₹22,000 करोड़ का पूरा बैंक लोन राइट-ऑफ नहीं है। कई रिपोर्ट्स और स्पष्टीकरणों में कहा गया है कि कंपनियों ने पहले ही बड़ी रकम चुकाई है और बाकी के लिए बातचीत चल रही है।

आम आदमी के लिए सबसे बड़ी सीख

यह केस पर्सनल फाइनेंस और मनी मैनेजमेंट के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है:

पर्सनल गारंटी बहुत खतरनाक हो सकती है  

 बिजनेस के लिए या किसी और के कर्ज पर गारंटी देना आसान लगता है, लेकिन डिफॉल्ट होने पर आपकी व्यक्तिगत संपत्ति भी खतरे में पड़ सकती है।

बड़े और छोटे कर्जदारों का फर्क  

 किसानों या आम लोगों को छोटे कर्ज पर भी सख्ती झेलनी पड़ती है, जबकि बड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया (IBC के तहत) अलग तरीके से चलती है। यह असमानता कई लोगों को परेशान करती है।

डेट मैनेजमेंट और रिस्क असेसमेंट  

 कोई भी गारंटी या लोन लेने से पहले अपनी रेपमेंट कैपेसिटी, एसेट वैल्यूएशन और सबसे खराब स्थिति (worst-case scenario) को जरूर समझें।

कानूनी प्रक्रिया की समझ  

 इन्सॉल्वेंसी कोड के तहत क्रेडिटर्स की कमर्शियल विजडम को प्राथमिकता दी जाती है। इसलिए सिर्फ “कर्ज माफ हो गया” समझना अधूरा है।

आपके पैसे का सही प्रबंधन कैसे करें?

कभी भी बिना पूरी समझ के पर्सनल गारंटी न दें।  

अपना इमरजेंसी फंड और एसेट प्रोटेक्शन प्लान मजबूत रखें।  

लोन लेते समय EMI और कुल ब्याज का सही कैलकुलेशन करें।  

बिजनेस और पर्सनल फाइनेंस को जितना हो सके अलग रखें।

सुभाष चंद्रा केस हमें याद दिलाता है कि कर्ज और गारंटी सिर्फ बड़े कारोबारियों का मुद्दा नहीं है। सही जानकारी और अनुशासन के बिना कोई भी व्यक्ति वित्तीय मुश्किल में फंस सकता है।

अपने पैसे का सही प्रबंधन सीखने और कर्ज से जुड़ी गलतियों से बचने के लिए www.beyourmoneymanager.com पर नियमित रूप से अपडेट्स पढ़ते रहें।

नोट: यह लेख उपलब्ध समाचार रिपोर्ट्स और स्पष्टीकरणों पर आधारित है। आंकड़े और कानूनी प्रक्रिया समय के साथ बदल सकते हैं।

Rajanish Kant
Happy Raksha Bandhan! रक्षाबंधन हमें Money Management के बारे में क्या सिखाता है? beyourmoneymanager

राखी सिर्फ भाई-बहन के रिश्ते का धागा नहीं है, यह जिम्मेदारी, सुरक्षा और भविष्य की चिंता का भी प्रतीक है। अगर हम रक्षाबंधन को थोड़े अलग नजरिए से देखें, तो इस त्योहार में Money Management और Financial Planning के कई महत्वपूर्ण सबक छिपे हुए हैं।

आज रक्षाबंधन पर भाई अपनी बहन को पैसे, कपड़े, गहने या कोई अन्य उपहार देता है। लेकिन क्या हो अगर इस बार राखी का उपहार सिर्फ आज की खुशी न देकर कल की आर्थिक सुरक्षा भी सुनिश्चित करे?

यही सोच हमें रक्षाबंधन से मिलने वाले कुछ महत्वपूर्ण Money Management Lessons तक ले जाती है।

1. असली सुरक्षा सिर्फ पैसे देने से नहीं, Financial Security देने से होती है

रक्षाबंधन का अर्थ ही है—रक्षा का बंधन। पर आज के समय में किसी अपने की रक्षा का अर्थ केवल मुश्किल समय में साथ खड़ा होना नहीं है।

आर्थिक रूप से सुरक्षित बनाना भी एक तरह की रक्षा है।

अगर भाई अपनी बहन को हर साल केवल ₹5,000 या ₹10,000 का गिफ्ट देता है, तो वह पैसा कुछ समय बाद खर्च हो सकता है। लेकिन अगर वही पैसा बचत या निवेश की शुरुआत करने में लगाया जाए, तो वह भविष्य में बड़ा Financial Corpus बनाने में मदद कर सकता है।

इसलिए इस रक्षाबंधन एक सवाल जरूर पूछें:

"मैं अपने भाई या बहन को ऐसा क्या दे सकता हूं, जो आने वाले वर्षों में भी उसके काम आए?"

2. छोटी बचत को कभी छोटा मत समझिए

राखी का धागा देखने में छोटा होता है, लेकिन उसका भाव बहुत बड़ा होता है।

Money Management में भी यही बात लागू होती है।

हर महीने ₹500, ₹1,000 या ₹2,000 की बचत शुरुआत में बहुत छोटी लग सकती है। लेकिन नियमित रूप से की गई बचत और लंबे समय तक किया गया निवेश भविष्य में बड़ा फंड बना सकता है।

यही Consistency की Power है।

मान लीजिए कोई व्यक्ति हर महीने ₹2,000 निवेश करना शुरू करता है। शुरुआत में यह राशि छोटी लग सकती है, लेकिन वर्षों तक नियमित निवेश और compounding के कारण इसका प्रभाव काफी बड़ा हो सकता है।

इसलिए Financial Planning का पहला नियम हो सकता है:

राशि छोटी हो सकती है, लेकिन शुरुआत छोटी नहीं होनी चाहिए।

3. Gift और Investment में फर्क समझिए

रक्षाबंधन पर महंगा gift खरीदना आसान है।

लेकिन एक ऐसा gift देना जो भविष्य में Financial Independence की दिशा में कदम बने—यह ज्यादा समझदारी भरा फैसला हो सकता है।

उदाहरण के लिए, किसी की उम्र और Financial Goals के अनुसार:

Investment की शुरुआत

SIP की शुरुआत

Emergency Fund के लिए योगदान

Financial Education की कोई अच्छी किताब

Health या Life Insurance की जरूरत को समझना

किसी बड़े Financial Goal के लिए बचत

इनमें से कोई भी उपहार लंबे समय में ज्यादा मूल्यवान साबित हो सकता है।

हाल के वर्षों में रक्षाबंधन को Financial Independence और Investment से जोड़कर देखने की चर्चा भी बढ़ी है। 

4. भाई-बहन के बीच Money Conversation जरूरी है

भारत में परिवारों में पैसे की बात अक्सर खुले तौर पर नहीं की जाती।

कितनी Income है?

कितनी Saving है?

कितना Loan है?

कहां Investment किया है?

Emergency में कितने पैसे उपलब्ध हैं?

इन सवालों पर बातचीत करने में कई लोगों को असहजता होती है।

लेकिन भाई-बहन एक-दूसरे के सबसे भरोसेमंद लोगों में से हो सकते हैं। इसलिए रक्षाबंधन का अवसर एक अच्छी Money Conversation की शुरुआत हो सकता है।

इस बार राखी पर सिर्फ यह मत पूछिए—

"गिफ्ट में क्या चाहिए?"

यह भी पूछिए—

"तुम्हारा अगला Financial Goal क्या है?"

शायद यही बातचीत किसी के Financial Future को बदल दे।

5. Financial Independence भी एक तरह की रक्षा है

परंपरागत रूप से रक्षाबंधन में भाई अपनी बहन की रक्षा करने का वचन देता है। आज के समय में इस भावना को एक नए तरीके से समझने की जरूरत है।

किसी को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना भी उसकी रक्षा करना है।

अगर किसी महिला के पास:

अपनी Savings है,

अपना Emergency Fund है,

पर्याप्त Insurance है,

अपने नाम पर Investments हैं,

और अपने Financial Decisions लेने की समझ है,

तो वह Financially ज्यादा मजबूत होती है।

इसलिए बहन को सिर्फ "मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं" कहना ही पर्याप्त नहीं है।

कभी-कभी बेहतर संदेश यह हो सकता है:

"मैं चाहता हूं कि तुम इतनी Financially Strong बनो कि तुम्हें किसी पर आर्थिक रूप से निर्भर न रहना पड़े।"

6. आज का खर्च और कल का लक्ष्य—दोनों में Balance जरूरी है

त्योहार खुशी मनाने के लिए होते हैं और उन पर खर्च करना गलत नहीं है।

समस्या तब शुरू होती है जब त्योहार मनाने के लिए हम अपनी क्षमता से ज्यादा खर्च करने लगते हैं।

महंगे gifts, unnecessary shopping, credit card spending और बाद में EMI का बोझ—यह Money Management नहीं है।

एक स्वस्थ Financial Habit यह है कि:

पहले Budget तय करें, फिर खर्च करें।

रक्षाबंधन पर भी एक छोटा Festival Budget बनाया जा सकता है।

उदाहरण:

कुल बजट: ₹10,000

₹3,000 — Gift

₹2,000 — परिवार/त्योहार का खर्च

₹2,000 — Savings

₹3,000 — Investment या Financial Goal

यह केवल उदाहरण है। वास्तविक allocation व्यक्ति की Income, जरूरतों और Financial Goals के अनुसार होना चाहिए।

7. Emergency Fund: मुश्किल समय के लिए आर्थिक राखी

राखी हमें मुश्किल समय में साथ खड़े रहने की याद दिलाती है।

Money Management में इसका सबसे अच्छा उदाहरण है Emergency Fund।

अचानक नौकरी चली जाए, Medical Emergency आ जाए, Business में समस्या हो जाए या कोई बड़ा अनपेक्षित खर्च सामने आ जाए—ऐसे समय में Emergency Fund आर्थिक सहारा देता है।

इसलिए अपने परिवार के लिए एक Financial Safety Net बनाना भी किसी राखी से कम नहीं है।

आज की छोटी Financial Preparation, कल की बड़ी परेशानी को संभाल सकती है।

8. बच्चों को Rakhi के साथ Money Management भी सिखाएं

रक्षाबंधन बच्चों को Money Management सिखाने का शानदार अवसर हो सकता है।

अगर बच्चा राखी पर ₹1,000 पाता है, तो पूरा पैसा खर्च करने के बजाय उसे तीन हिस्सों में बांटना सिखाया जा सकता है:

Spend – Save – Invest

उदाहरण के लिए:

₹400 — अपनी पसंद की चीज खरीदने के लिए

₹300 — Saving

₹300 — किसी Financial Goal या Investment के लिए

इससे बच्चे को कम उम्र में ही यह समझ आने लगता है कि पैसा सिर्फ खर्च करने की चीज नहीं है।

9. सबसे बड़ा Financial Gift है—Financial Education

पैसा देना आसान है।

पैसा कमाने, बचाने, निवेश करने और सही Financial Decisions लेने की समझ देना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

अगर इस रक्षाबंधन आप अपने भाई या बहन को कोई Financial Book देते हैं, उनके साथ Budget बनाते हैं, Investment के बारे में चर्चा करते हैं या उन्हें Financial Planning शुरू करने के लिए प्रेरित करते हैं, तो यह ऐसा gift हो सकता है जिसका फायदा वर्षों तक मिलता रहे।

क्योंकि:

Financial Education ऐसी संपत्ति है जिसे कोई आपसे छीन नहीं सकता।

10. इस रक्षाबंधन एक Financial Promise भी करें

इस बार राखी बांधते और बंधवाते समय एक नया संकल्प लिया जा सकता है।

भाई-बहन मिलकर एक Financial Promise करें:

"हम एक-दूसरे को सिर्फ भावनात्मक रूप से नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी मजबूत बनने में मदद करेंगे।"

इसके लिए साल में कम से कम एक बार बैठकर अपने Financial Goals पर चर्चा करें:

कितनी Saving हुई?

कितना Investment हुआ?

Emergency Fund कितना है?

कोई अनावश्यक Debt तो नहीं?

अगले वर्ष का Financial Goal क्या है?

यह छोटी-सी आदत भाई-बहन के रिश्ते को एक नए Financial Dimension से जोड़ सकती है।

रक्षाबंधन का असली Financial Lesson

रक्षाबंधन हमें सिखाता है कि रक्षा केवल आज की नहीं, भविष्य की भी होनी चाहिए।

जैसे राखी का एक छोटा-सा धागा रिश्ते की बड़ी जिम्मेदारी का प्रतीक है, वैसे ही छोटी-सी Saving भविष्य की बड़ी Financial Security की नींव बन सकती है।

इसलिए इस रक्षाबंधन:

महंगे Gift से ज्यादा जरूरी Financial Security को महत्व दें।

बड़ी-बड़ी बातों से ज्यादा जरूरी छोटी-छोटी Financial Habits बनाएं।

सिर्फ पैसा देने के बजाय Money Management सिखाएं।

और सबसे महत्वपूर्ण—

"अपने रिश्तों की तरह अपने पैसों की भी जिम्मेदारी लीजिए।"

क्योंकि Financially Strong परिवार सिर्फ ज्यादा पैसा कमाने से नहीं बनता, बल्कि सही तरीके से पैसा कमाने, बचाने, खर्च करने, निवेश करने और भविष्य की Planning करने से बनता है।

Be Your Money Manager का उद्देश्य भी यही है—आपको अपने पैसे का ऐसा Manager बनाना, जो अपने Financial Decisions को समझदारी से ले और अपने भविष्य को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में लगातार काम करे।

इस रक्षाबंधन एक नई शुरुआत करें

इस बार राखी के साथ अपने भाई या बहन को एक ऐसा उपहार दें जो केवल आज मुस्कान न दे, बल्कि कल Financial Confidence भी दे।

क्योंकि सबसे खूबसूरत राखी वही है, जिसके साथ भविष्य की सुरक्षा का संकल्प भी जुड़ा हो।

Happy Raksha Bandhan!

और इस बार कहिए—"रिश्ता भी मजबूत, Financial Future भी मजबूत।"


Rajanish Kant
सरकारी कर्ज बढ़ने तक सोने की कीमतें ऊंची रहेंगी: $10,000 लक्ष्य भूल जाएं – जॉन लाफोर्ज की राय | BeYourMoneyManager

पिछले कुछ वर्षों में सोने (Gold) की कीमतों में नाटकीय उछाल आया है। जो स्तर कभी असंभव लगते थे, वे अब वास्तविकता बन चुके हैं। फिर भी, एक प्रमुख बाजार रणनीतिकार का कहना है कि निवेशकों को सिर्फ कीमत के लक्ष्यों ($8,000, $10,000 या $12,000 प्रति औंस) पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए।

नेड डेविस रिसर्च (NDR Research) के चीफ अल्टरनेटिव स्ट्रैटेजिस्ट जॉन लाफोर्ज (John LaForge) ने किटको न्यूज के साथ बातचीत में स्पष्ट कहा कि सोने का दीर्घकालिक रुझान तब तक ऊपर की ओर बना रहेगा, जब तक दुनिया भर की सरकारें अपने बढ़ते कर्ज के बोझ से नहीं निपटतीं।

लाफोर्ज के अनुसार, “मुझे लगता है कि कीमतें तब चरम पर पहुंचेंगी जब हम कर्ज की स्थिति से निपटना सीख लेंगे। जितना लंबा हम इसे टालते रहेंगे, कर्ज चुकाए बिना और बढ़ाते रहेंगे, सोने की कीमतें उतनी ही ऊंची जा सकती हैं।”

वे कहते हैं कि $8,000, $10,000 या $12,000 जैसे आंकड़े उनके दृष्टिकोण में खास मायने नहीं रखते। “मेरे लिए कोई निश्चित बिंदु नहीं है कि ‘अरे अब 8,000 हो गया’ या ‘12,000 हो गया’। मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि जब तक सरकारी कर्ज से नहीं निपटा जाता, ट्रेंड ऊपर ही रहेगा। मुझे लगता है कि हम अभी कई सालों तक ऊंची कीमतें देख सकते हैं क्योंकि वैश्विक स्तर पर राजनीतिज्ञ और नेता इससे निपटने को तैयार नहीं दिखते।”

पिछले दशक में सोना लगभग $1,500 प्रति औंस से बढ़कर $4,000 से ऊपर पहुंच चुका है। लाफोर्ज का मानना है कि अभी भी काफी गुंजाइश बाकी है। वे वर्तमान कमोडिटी सुपरसाइकल को लगभग 6-7 साल पुराना बताते हैं और कहते हैं कि लंबे समय के रुझान के थकने का कोई सबूत नहीं है।

इस चक्र की सबसे बड़ी ताकत यह है कि केंद्रीय बैंक अब सोने की संरचनात्मक मांग का महत्वपूर्ण स्रोत बन गए हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी विदेशी भंडारों को फ्रीज किए जाने के बाद कई केंद्रीय बैंकों ने महसूस किया कि पारंपरिक रिजर्व एसेट्स सरकारी नियंत्रण के जोखिम में हैं। सोना एक दुर्लभ “बियरर एसेट” है जिसे भौतिक रूप से क्रेडिट सिस्टम के बाहर रखा जा सकता है और दुनिया भर में स्वीकार किया जाता है।

सरकारी कर्ज में भारी वृद्धि हार्ड एसेट्स के लिए सबसे बड़ा टेलविंड बन रही है। लाफोर्ज कहते हैं कि कर्ज चुकाने का कोई आसान राजनीतिक तरीका नहीं बचा है, सिवाय मुद्रा के अवमूल्यन (currency debasement) के। “इससे निपटने का कोई तरीका नहीं है सिवाय हर चीज को कमजोर करने के। यह सोने के लिए अब तक का सबसे बड़ा अनुकूल कारक है।”

अमेरिका का सरकारी कर्ज $40 ट्रिलियन से ऊपर पहुंच चुका है, लेकिन लाफोर्ज जापान को भी एक महत्वपूर्ण चेतावनी मानते हैं। पश्चिमी देश उम्मीद कर रहे थे कि जापान यील्ड कर्व कंट्रोल के जरिए लंबे समय तक उधारी लागत को दबाए रख सकता है, लेकिन अब जापानी यील्ड्स बढ़ रही हैं और दशकों की अल्ट्रा-लूज मौद्रिक नीति उलटी हो रही है।

लाफोर्ज ने सोने में महीनों लंबी सुधार (correction) के दौरान भी बुलिश रुख बनाए रखा क्योंकि सरकारी कर्ज बढ़ता रहा। उन्होंने कहा कि लंबी अवधि के मोमेंटम संकेतकों में कोई ब्लो-ऑफ टॉप सिग्नल नहीं दिखा, जो आमतौर पर सुपरसाइकल के अंत में दिखाई देते हैं। वर्तमान मोमेंटम 2011 के शिखर के आसपास देखी गई सट्टा अधिकता से ज्यादा मिड-साइकल मूव जैसा लगता है।

पोर्टफोलियो रणनीति के बारे में लाफोर्ज सुझाव देते हैं कि निवेशकों को कम से कम 10% अल्टरनेटिव एसेट्स में आवंटन करना चाहिए—लगभग 5% सोना, 3% व्यापक कमोडिटी बास्केट और 2% बिटकॉइन। सोने को सबसे ज्यादा वजन इसलिए मिलना चाहिए क्योंकि यह वर्तमान चक्र को चलाने वाले संरचनात्मक कर्ज और मौद्रिक दबावों के लिए सबसे सीधा एक्सपोजर देता है।

लाफोर्ज का निष्कर्ष साफ है: सोने के बुल मार्केट का अंत किसी निश्चित कीमत स्तर से नहीं, बल्कि तब होगा जब सरकारें राजकोषीय अनुशासन अपनाएंगी और क्रेडिट-आधारित मौद्रिक प्रणाली में विश्वास बहाल करेंगी। तब तक संरचनात्मक रुझान बदलने का कोई मजबूत कारण नहीं दिखता।

“यह पूरी तरह पटरी से नहीं उतरा है, लेकिन ऐसा लगता है जैसे ट्रेन की रफ्तार 40 मील प्रति घंटे से 120 हो गई हो। हमें इसे धीमा करना होगा, वरना ट्रैक पर नहीं रह पाएंगे।”

निष्कर्ष (BeYourMoneyManager के लिए):  

सोना सिर्फ एक कीमती धातु नहीं, बल्कि बढ़ते सरकारी कर्ज और मुद्रा अवमूल्यन के खिलाफ एक सुरक्षा कवच है। दीर्घकालिक निवेशकों को कीमत के शॉर्ट-टर्म लक्ष्यों से ज्यादा फंडामेंटल्स पर ध्यान देना चाहिए। हमेशा अपने जोखिम प्रोफाइल और वित्तीय लक्ष्यों के अनुसार पोर्टफोलियो बनाएं।

(नोट: यह लेख सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। निवेश निर्णय लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श करें।)

यह मूल लेख किटको न्यूज पर प्रकाशित जॉन लाफोर्ज के साक्षात्कार पर आधारित है 

Rajanish Kant