Trump ने मजबूत Jobs Report के बाद फेड से ब्याज दरें कम करने की मांग की – अमेरिकी Economy पर बड़ा असर? भारतीय निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है? beyourmoneymanager

ट्रम्प ने मजबूत जॉब्स रिपोर्ट के बाद फेड से ब्याज दरें कम करने की मांग की

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अगस्त 2026 की मजबूत रोजगार रिपोर्ट जारी होने के तुरंत बाद फेडरल रिजर्व (फेड) से ब्याज दरें कम करने की जोरदार अपील की है। ट्रम्प ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है, इसलिए ब्याज दरें घटानी चाहिए।

अगस्त में अमेरिकी नियोक्ताओं ने 1,62,000 नई नौकरियां जोड़ीं। यह आंकड़ा विश्लेषकों के अनुमान (लगभग 53,000 से 56,000) से लगभग तीन गुना ज्यादा था। ट्रम्प ने इसे “शानदार जॉब्स नंबर” बताया और दावा किया कि यह उनके अनुमान को छोड़कर सभी अनुमानों को तोड़ रहा है।

ट्रम्प ने लिखा, “मजबूत देश का मतलब है कम ब्याज दर – यह बेहतर क्रेडिट है... बहुत सरल! हमें दुनिया के किसी भी देश की तुलना में सबसे कम ब्याज दर मिलनी चाहिए, जैसे पुराने दिनों में थी।” उन्होंने कहा कि ऊंची ब्याज दरें अमेरिका को अनुचित नुकसान पहुंचा रही हैं और वह इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे।

उन्होंने फेड बोर्ड और उसके नए नेता (केविन वॉर्श) से “स्मार्ट” बनने और “देशभक्त” होने की अपील की। ट्रम्प ने यहां तक चेतावनी दी कि अगर दरें कम नहीं की गईं तो वह उन देशों के साथ व्यापार बंद कर देंगे जिनके साथ अमेरिका का व्यापार घाटा है। उन्होंने इसे टैरिफ से बेहतर विकल्प बताया।

बाजार और फेड पर असर
आमतौर पर मजबूत जॉब्स रिपोर्ट से फेड ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना बढ़ जाती है, क्योंकि मजबूत अर्थव्यवस्था मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ा सकती है। रिपोर्ट के बाद बाजारों में सितंबर की बैठक में दर बढ़ाने की संभावना बढ़ गई। फेड की अगली बैठक 15-16 सितंबर को होनी है।

ट्रम्प का यह रुख फेड की स्वतंत्रता पर दबाव डालने वाला माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रम्प का तर्क पारंपरिक आर्थिक सोच के विपरीत है, जहां मजबूत अर्थव्यवस्था और मुद्रास्फीति के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए दरें ऊंची रखी जाती हैं।

भारतीय निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है?
अमेरिकी ब्याज दरों में बदलाव का असर वैश्विक बाजारों, डॉलर की ताकत, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेश (FII) पर पड़ता है। अगर फेड दरें कम करता है तो अमेरिकी शेयर बाजार और उभरते बाजारों (जैसे भारत) में पूंजी प्रवाह बढ़ सकता है। वहीं, अगर दरें बढ़ती हैं तो डॉलर मजबूत हो सकता है और भारतीय बाजारों पर दबाव पड़ सकता है।

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नोट: यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्य के लिए है। कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह लें।

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