दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: लंच ब्रेक के दौरान कार्यस्थल पर हुई दुर्घटना भी रोजगार के दौरान मानी जाएगी। कर्मचारी यशपाल को 7.86 लाख रुपये मुआवजा और 12% ब्याज मिला। जानें पूरा मामला और आपके अधिकार
लंच ब्रेक में हुई दुर्घटना भी नौकरी से जुड़ी मानी जाएगी – दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, कर्मचारी को मिले 7.86 लाख रुपये मुआवजा
क्या लंच ब्रेक के दौरान कार्यस्थल पर हुई दुर्घटना को “रोजगार के दौरान” माना जा सकता है? दिल्ली हाईकोर्ट ने इस सवाल का जवाब साफ देते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने बीमा कंपनी की अपील खारिज करते हुए कर्मचारी को ₹7.86 लाख मुआवजा और 12% सालाना ब्याज देने का आदेश बरकरार रखा।
क्या था पूरा मामला?
श्री यशपाल दिल्ली के भलस्वा इलाके में एक निर्माण स्थल पर सुपरवाइजर के रूप में काम कर रहे थे। 22 जून 2010 को उन्होंने अपना काम पूरा करने के बाद लंच कर रहे थे। तभी मोबाइल क्रेन से उठाया जा रहा लोहे का रॉड अचानक उन पर गिर पड़ा। गंभीर चोटों के कारण डॉक्टरों को उनकी बाईं टांग काटनी पड़ी।
यशपाल ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 के तहत मुआवजे का दावा किया। कर्मचारी मुआवजा आयुक्त, दिल्ली ने 28 अप्रैल 2016 को आदेश दिया कि बीमा कंपनी उन्हें ₹7,86,492 रुपये का मुआवजा 12% सालाना ब्याज के साथ 22 जुलाई 2010 से भुगतान करे।
बीमा कंपनी ने क्यों किया विरोध?
बीमा कंपनी (नेशनल इंश्योरेंस) ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी और कई तर्क दिए:
- यशपाल का क्रेन मालिक के साथ कर्मचारी-नियोक्ता संबंध नहीं था।
- दुर्घटना लंच ब्रेक के दौरान हुई, इसलिए यह रोजगार से जुड़ी नहीं मानी जा सकती।
- वे सुपरवाइजर थे, इसलिए अधिनियम की धारा 2(dd) के तहत “कर्मचारी” की परिभाषा में नहीं आते।
- 75% विकलांगता का दावा सही तरीके से साबित नहीं हुआ।
- वेतन और ब्याज की गणना गलत है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी ने 23 जुलाई 2026 को दिए गए फैसले में बीमा कंपनी के सभी तर्क खारिज कर दिए। अदालत ने साफ कहा:
- “भोजन के लिए अस्थायी ब्रेक अपने आप में रोजगार और दुर्घटना के बीच के संबंध को खत्म नहीं करता।”
- दुर्घटना कार्यस्थल पर हुई और यशपाल वहां अपने रोजगार के सिलसिले में मौजूद थे। इसलिए यह दुर्घटना “रोजगार से उत्पन्न और उसके दौरान” मानी जाएगी।
- सिर्फ “सुपरवाइजर” का पदनाम पर्याप्त नहीं है। असली काम की प्रकृति देखनी होगी। यशपाल निर्माण स्थल पर काम कर रहे थे और प्रबंधकीय/प्रशासनिक कार्य करने का कोई ठोस सबूत नहीं दिया गया।
- मेडिकल बोर्ड द्वारा जारी 75% स्थायी विकलांगता का प्रमाणपत्र सही है और आयुक्त ने सही तरीके से कमाई की क्षमता में नुकसान का आकलन किया।
अदालत ने आयुक्त के आदेश में कोई हस्तक्षेप न करते हुए बीमा कंपनी को पूरा मुआवजा और ब्याज चुकाने का निर्देश दिया।
इस फैसले से क्या सीख मिलती है?
यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए राहत भरा है जो कार्यस्थल पर लंच, टी ब्रेक या छोटी-मोटी रुकने के दौरान दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। अदालत ने दोहराया कि कार्यस्थल पर उपस्थिति और रोजगार से जुड़ाव मुख्य बात है।
नए श्रम संहिताओं में सुरक्षा उपायों पर ज्यादा जोर दिया गया है, लेकिन पुराने अधिनियम के तहत भी कर्मचारी के अधिकार मजबूत हैं।
आपको क्या करना चाहिए?
अगर कार्यस्थल पर कोई दुर्घटना होती है (चाहे लंच ब्रेक में ही क्यों न हो), तो:
- तुरंत मेडिकल रिपोर्ट और पुलिस/कंपनी रिकॉर्ड रखें।
- कर्मचारी मुआवजा आयुक्त के पास दावा दायर करें।
- बीमा कंपनी के इनकार पर हार न मानें – उच्च न्यायालय तक जा सकते हैं।
यह केस साबित करता है कि सही सबूत और कानूनी लड़ाई से कर्मचारी अपने अधिकार हासिल कर सकते हैं।
स्रोत: दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला (FAO 493/2016) और संबंधित रिपोर्ट्स।

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