सोने के दाम क्यों गिर रहे हैं? वेस्ट एशिया तनाव के बीच गोल्ड प्राइस में भारी गिरावट के 5 बड़े कारण



वेस्ट एशिया संघर्ष शुरू होने के बाद सोने के दाम क्यों गिर गए? ब्याज दरों की उम्मीदें, मजबूत डॉलर, तेल की कीमतों में उछाल और लिक्विडिटी क्रंच के कारण गोल्ड प्राइस ₹1.9 लाख से घटकर ₹1.3 लाख प्रति 10 ग्राम हो गया। जानिए विस्तार से और आगे क्या होगा। 

दाम क्यों गिर रहे हैं? वेस्ट एशिया तनाव के बीच गोल्ड प्राइस में भारी गिरावट के प्रमुख कारण:

सोना हमेशा से संकट के समय सुरक्षित निवेश माना जाता है। लेकिन 28 फरवरी 2026 को वेस्ट एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद इस बार पैटर्न उलटा पड़ गया। भारत में 24 कैरेट सोने की कीमत जनवरी के अंत में लगभग ₹1.9 लाख प्रति 10 ग्राम से घटकर अब ₹1.3 लाख प्रति 10 ग्राम रह गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी गोल्ड प्राइस $5,000 प्रति ट्रॉय औंस के ऊपर से काफी नीचे आ गया।ऐतिहासिक रूप से सोना संकट में चमकता रहा है — 2008 के वित्तीय संकट, कोविड-19 महामारी और 2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान इसमें तेजी आई थी। 

लोयोला कॉलेज, चेन्नई के पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर भगवान दास कहते हैं, “राजनीतिक, सैन्य, वित्तीय या तेल संकट के समय सबसे पहले लोग सोने की ओर भागते हैं।”

इस बार सोने के दाम क्यों गिरे? 5 बड़े कारण

1-ब्याज दरों की उम्मीदें बदल गईं:

पहले महंगाई कम हो रही थी और ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद थी, जिससे सोना आकर्षक लग रहा था। लेकिन वेस्ट एशिया संघर्ष के कारण तेल की कीमतें $120 प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गईं (2022 के बाद सबसे बड़ा सप्लाई शॉक)। इससे महंगाई बढ़ने का डर पैदा हो गया। अब बाजार उम्मीद कर रहा है कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रखेंगे। इससे बॉन्ड ज्यादा आकर्षक हो गए और सोने की चमक फीकी पड़ गई।

2-मजबूत अमेरिकी डॉलर का असर:

सोना डॉलर में ट्रेड किया जाता है। जब डॉलर मजबूत होता है तो अन्य मुद्राओं वाले खरीदारों के लिए महंगा हो जाता है, जिससे मांग घटती है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की भारत प्रमुख कविता चाको कहती हैं, “मजबूत डॉलर सोने को होल्ड करने की लागत बढ़ाता है और यह कीमतों पर बड़ा असर डाल रहा है।”

3-तेल संकट और महंगाई का डर:

तेल की कीमतों में उछाल से महंगाई बढ़ने की आशंका ने ब्याज दरों को ऊंचा रखने की उम्मीद पैदा कर दी। इससे सोने जैसी नॉन-यील्डिंग एसेट कम आकर्षक हो गई।

4-लिक्विडिटी क्रंच और प्रॉफिट बुकिंग:

सोना पिछले दो साल में दोगुना होकर जनवरी 2026 में ₹1.8 लाख प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गया था। कीमतें गिरने पर ऑटोमेटेड सेलिंग ट्रिगर हो गई। स्टॉक मार्केट में भी तेज गिरावट आई तो निवेशकों ने सोने में बुक किए गए मुनाफे को निकालकर दूसरी जगहों पर नुकसान पूरा करने की कोशिश की। कविता चाको कहती हैं, “यह लिक्विडिटी का मुद्दा है। दूसरे एसेट क्लास में नुकसान हुआ तो यहां से प्रॉफिट बुक करके उसे कवर किया जा रहा है।”

5-डॉलर अस्थायी रूप से सुरक्षित ठिकाना बन गया:

तेल की ऊंची कीमतों के कारण डॉलर की मांग बढ़ गई क्योंकि तेल डॉलर में खरीदा जाता है। भगवान दास कहते हैं, “तेल से होने वाली महंगाई के खतरे में अमेरिकी डॉलर ही सबसे पहला सहारा बन जाता है। सोना अस्थायी रूप से अपनी अपील खो चुका है।”

क्या सेंट्रल बैंक अभी भी सोना खरीद रहे हैं?

हां। 2025 में खरीदारी थोड़ी धीमी हुई लेकिन औसत से ऊपर रही। फरवरी 2026 में फिर रिबाउंड देखा गया। रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद सोने की “अनसैंक्शनेबल” प्रकृति ने भी इसकी अहमियत बढ़ाई है।

आम निवेशक को चिंता करने की जरूरत?

नहीं। बाजार में सुधार (करेक्शन) सामान्य है। 2011 और 2020 में भी सोना गिरा था लेकिन बाद में रिकवर हो गया। भारत में हाई प्राइस पर ज्वेलरी डिमांड थोड़ी कम हुई, लेकिन ETF में इनफ्लो 10 महीने तक पॉजिटिव रहा। फरवरी में आयात पिछले साल से 80% ज्यादा था। कविता चाको कहती हैं, “अंडरलाइंग डिमांड अभी भी मजबूत है। कीमतें स्थिर होने पर खरीदारी में तेजी आ सकती है। सेंटिमेंट बुलिश है।”आगे क्या होगा?अगर संघर्ष शांत हुआ और तेल की कीमतें स्थिर हुईं तो ब्याज दरों की उम्मीदें नरम होंगी और सोना रिकवर कर सकता है।

अगर संकट बढ़ा तो स्टैगफ्लेशन का खतरा रहेगा, जो ऐतिहासिक रूप से सोने के लिए अच्छा रहा है।

भगवान दास कहते हैं, “हर बाजार में प्राइस करेक्शन सामान्य है। सोना भविष्य में जरूर बढ़ेगा। यह अस्थायी स्थिति है।”

निष्कर्ष:

वर्तमान गिरावट ब्याज दरों, मजबूत डॉलर और लिक्विडिटी दबाव के कारण है, न कि सोने की मौलिक मजबूती में कमी के कारण। लंबी अवधि में डिमांड मजबूत बनी हुई है और निवेशकों के लिए यह खरीदारी का अच्छा मौका भी साबित हो सकता है।



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