मोदी सरकार 1 जून यानी कल से देश में इक्वलाइजेशन लेवी लागू करने जा रही है। वित्त मंत्रालय ने इस साल के बजट में कर प्रावधानों को सुसंगत बनाने के लिए इस बार के वित्तीय बजट में इस लेवी का प्रस्ताव किया था। इसे 'गूगल टैक्स' के नाम से भी जाना जाता है। भारत दुनिया का पहला देश है जो इक्वलाइजेशन लेवी लागू कर इस ऑप्शन का इस्तेमाल करने जा रहा है।
क्या है इक्वालाइजेशन लेवी या गूगल टैक्स: इसके तहत देश के कारोबारियों द्वारा विदेशी ऑनलाइन सर्विस प्रोवाइडरों, मसलन गूगल, याहू, ट्विटर, फेसबुक आदि को दिए ऑनलाइन ऐड के लिए भुगतान की गई राशि पर 6% लेवी वसूला जाएगा, बशर्ते पेमेंट की राशि पूरे वित्त वर्ष में एक लाख रुपए को पार कर जाए। ये लेवी सिर्फ बिजनस टु बिजनस (B2B) ट्रांसेक्शंस पर ही लगेगा। इसे दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि भारतीय कंपनियों के ऑनलाइन विज्ञापन से कमाई करने वाली विदेशी इंटरनेट या ई-कॉमर्स कंपनियों को अपनी इस आमदनी पर इक्वालाइजेशन लेवी देना पड़ेगा।
इक्वालाइजेशन लेवी के अंतर्गत आने वाली सेवाएं:
ई-कॉमर्स ट्रांसेक्शंस पर टैक्सेशन पर नजर रखने के लिए वित्त मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति ने ऑनलाइन ऐड्स के अलावा कई सर्विसेज पर इक्वलाइजेशन लेवी लगाने का सुझाव दिया था।
इनमें ऑनलाइन कॉन्टेंट (किसी वेबसाइट, ई-मेल्स, ब्लॉग, वस्तुओं या सेवाओं की ऑनलाइन बिक्री के लिए तैयार किए जाने वाले ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन पेमेंट प्लेटफॉर्म की डिजाइनिंग, क्रिएटिंग या होस्टिंग); गानों, फिल्मों,गेम्स, किताबें आदि का ऑनलाइन इस्तेमाल या उन्हें डाउनलोड करने एवं ऑनलाइन सर्च, ऑनलाइन मैप्स या ग्लोबल पॉजिशनिंग सिस्ट्मस ( GPS) ऐप्लिकेशंस भी शामिल हैं। इसके दायरे में रेडिया और टेलीविजन पर दिए जा रहे विज्ञापन भी शामिल हैं।
क्यों कहते हैं 'गूगल टैक्स':
चूंकि अधिकांश इंटरनेट के व्यापार व विज्ञापन गूगल के माध्यम से होते हैं इसलिए बोलचाल में इसे 'गूगल टैक्स' कहा जा रहा है।
'गूगल टैक्स' से किसको छूट:
अगर विदेशी सर्विस प्रोवाइडरों के भारत में स्थायी बिजनेस ऑफिस हैं और बिल भारत वाले ऑफिस से ही बनता है तो पेमेंट पर इक्वलाइजेशन लेवी नहीं लगाया जाएगा। यानी वे भारत में अपने कारोबारी सहयोगियों के जरिए मामले की डील करके इक्वलाइजेशन लेवी से बच सकते हैं।
'गूगल टैक्स' को लेकर क्या है दिक्कतें:
जानकारों के मुताबिक, इस टैक्स को लागू करने में एक बड़ी दिक्कत यह आ सकती है कि विदेशी कंपनियां अपने बिजनस डाटा संभवत: शेयर न करें। दूसरी, टैक्स की दर उन करों से कम है जो भारतीय कारोबारियों की इनकम पर लगाया जाता है। तीसरी दिक्कत यह है कि नोटिफिकेशन में जिस इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर की बात की गई है, उसे अभी उचित और पूरी तरह से कानूनी जामा नहीं पहनाया जा सका है।
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क्या है इक्वालाइजेशन लेवी या गूगल टैक्स: इसके तहत देश के कारोबारियों द्वारा विदेशी ऑनलाइन सर्विस प्रोवाइडरों, मसलन गूगल, याहू, ट्विटर, फेसबुक आदि को दिए ऑनलाइन ऐड के लिए भुगतान की गई राशि पर 6% लेवी वसूला जाएगा, बशर्ते पेमेंट की राशि पूरे वित्त वर्ष में एक लाख रुपए को पार कर जाए। ये लेवी सिर्फ बिजनस टु बिजनस (B2B) ट्रांसेक्शंस पर ही लगेगा। इसे दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि भारतीय कंपनियों के ऑनलाइन विज्ञापन से कमाई करने वाली विदेशी इंटरनेट या ई-कॉमर्स कंपनियों को अपनी इस आमदनी पर इक्वालाइजेशन लेवी देना पड़ेगा।
इक्वालाइजेशन लेवी के अंतर्गत आने वाली सेवाएं:
ई-कॉमर्स ट्रांसेक्शंस पर टैक्सेशन पर नजर रखने के लिए वित्त मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति ने ऑनलाइन ऐड्स के अलावा कई सर्विसेज पर इक्वलाइजेशन लेवी लगाने का सुझाव दिया था।
इनमें ऑनलाइन कॉन्टेंट (किसी वेबसाइट, ई-मेल्स, ब्लॉग, वस्तुओं या सेवाओं की ऑनलाइन बिक्री के लिए तैयार किए जाने वाले ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन पेमेंट प्लेटफॉर्म की डिजाइनिंग, क्रिएटिंग या होस्टिंग); गानों, फिल्मों,गेम्स, किताबें आदि का ऑनलाइन इस्तेमाल या उन्हें डाउनलोड करने एवं ऑनलाइन सर्च, ऑनलाइन मैप्स या ग्लोबल पॉजिशनिंग सिस्ट्मस ( GPS) ऐप्लिकेशंस भी शामिल हैं। इसके दायरे में रेडिया और टेलीविजन पर दिए जा रहे विज्ञापन भी शामिल हैं।
क्यों कहते हैं 'गूगल टैक्स':
चूंकि अधिकांश इंटरनेट के व्यापार व विज्ञापन गूगल के माध्यम से होते हैं इसलिए बोलचाल में इसे 'गूगल टैक्स' कहा जा रहा है।
'गूगल टैक्स' से किसको छूट:
अगर विदेशी सर्विस प्रोवाइडरों के भारत में स्थायी बिजनेस ऑफिस हैं और बिल भारत वाले ऑफिस से ही बनता है तो पेमेंट पर इक्वलाइजेशन लेवी नहीं लगाया जाएगा। यानी वे भारत में अपने कारोबारी सहयोगियों के जरिए मामले की डील करके इक्वलाइजेशन लेवी से बच सकते हैं।
'गूगल टैक्स' को लेकर क्या है दिक्कतें:
जानकारों के मुताबिक, इस टैक्स को लागू करने में एक बड़ी दिक्कत यह आ सकती है कि विदेशी कंपनियां अपने बिजनस डाटा संभवत: शेयर न करें। दूसरी, टैक्स की दर उन करों से कम है जो भारतीय कारोबारियों की इनकम पर लगाया जाता है। तीसरी दिक्कत यह है कि नोटिफिकेशन में जिस इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर की बात की गई है, उसे अभी उचित और पूरी तरह से कानूनी जामा नहीं पहनाया जा सका है।
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