वैश्विक संभावना और भारत : भारतीय रिज़र्व बैंक, गवर्नर
भुवनेश्वर में 21 मई 2016 को महताब स्मृति व्याख्यान करते हुए डॉ. रघुराम राजन, गवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक ने इस बात पर जोर डाला कि हालांकि विश्व की नीतियां भी भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए अनिश्चितता और अस्थिरता बढ़ा सकती हैं फिर भी वर्ष 2013 के ग्रीष्मकाल में “टैपर टैंट्रम” के समय से सरकार और केंद्रीय बैंक द्वारा किए गए उपायों से भारत वैश्विक अस्थिरता के लिए काफी बेहतर ढ़ंग से तैयार है।
उनके द्वारा बताए गए मुख्य बिन्दु इस प्रकार थे :
- विश्व में काफी धीमी गति से वृद्धि हो रही है और जबकि देशों के बीच धीमी वृद्धि के कारण अलग-अलग देशों में भिन्न-भिन्न हैं, फिर भी संभवतः कुछ आम कारक हैं।
- परिणामस्वरूप, औद्योगिक देशों और उभरते बाजारों के बीच वृद्धि अलग-अलग होना संभवतः भ्रामक है।
- जबकि औद्योगिकृत देशों में अंतिम मांग ऋण पूर्व-संकट से बढ़ी थी, जो बाद में डिलीवरेज से कम हो गई, उभरते बाजारों को अपने निर्यात मॉडलों में परिवर्तन करने की आवश्यकता थी क्योंकि औद्योगिक देश अपने माल को उतनी बड़ी मात्रा में नहीं लाए। इसके अतिरिक्त, औद्योगिक देशों में बचत और निवेश के परिपक्वन प्रभावों को ठीक ढ़ंग से नहीं समझा गया और यही उत्पादकता में मंदी के कारण थे। इससे देशों के लिए मांग को बढ़ावा देने वाली सही नीतियां निर्धारित करना फिर से कठिन हो गया।
- औद्योगिक देशों में संभावित वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए संरचनात्मक सुधार संभवतः अभी भी उपयोगी हैं, उदाहरण के लिए सेवाओं में प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने वाले सुधार और श्रम बाजारों में लचीलापन बढ़ाने वाले सुधार किंतु ये राजनीतिक तौर पर कठिन कार्य है।
- औद्योगिक देशों मे आसान और अपारंपरिक मौद्रिक नीति काफी हद तक इस समस्या का एक भाग हो सकती है। उदाहरण के लिए, यह असक्षम कंपनियों को कारोबार को जारी रखने की अनुमति देकर कम उत्पादकता में योगदान दे सकती है। इससे स्टार्ट-अप्स द्वारा नया आने वाला निवेश भी हतोत्साहित हो सकता है। इसी समय, कम ब्याज दरें बचत को बढ़ावा दे सकती हैं क्योंकि लोग यह पाते हैं कि उन्हें और बचत करने की आवश्यकता है जिससे कि वे उतनी राशि पर पहुंच सकें जिसकी एक आरामदायक सेवानिवृत्ति के लिए आवश्यकता है। इस प्रकार, न ही तो निवेश और न ही उपभोग बढ़ सकता चाहे दरें अपने वास्तविक निम्न स्तरों से कम हो जाएं। इसके अलावा, औद्योगिक देशों से उभरते देशों में कम ब्याज दरों से प्रेरित पूंजीगत प्रवाहों का प्रतिकूल प्रभाव भी अस्थिरता पैदा कर सकता है जो मंदी को उभरते बाजारों तक फैलाएगा।
- दुर्भाग्यवश, चाहे आक्रामक मौद्रिक नीति का कम सकारात्मक प्रभाव होता है, जिसमें से उसका अधिकांश प्रभाव मुद्रा का मूल्यह्रास करने और अन्य देशों से मांग प्राप्त करने से आता है, औद्योगिक देशों में केंद्रीय बैंकरों को उनकी मौद्रिक नीति फ्रेमवर्क से अधिदेश प्राप्त है कि वे आक्रामक ही रहें। समस्या यह है कि उनके लिए इस फ्रेमवर्क में जिम्मेदार वैश्विक नागरिक की तरह व्यवहार करने की अपेक्षा नहीं है क्योंकि उनके अधिदेश में देशी अर्थव्यवस्था को पुनरुज्जीवित करना हर चीज से आगे है।
- आगे, यह भी अच्छा होगा कि यदि बड़े केंद्रीय बैंक अधिक अंतरराष्ट्रीय रूप से सोचना शुरू कर दें। उन्हें ऐसा करने में प्रोत्साहन देने हेतु, हमें अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में मौद्रिक नीति के खेल में नए नियमों पर चर्चा शुरू करने की जरूरत है।
- नए नियम विकसित होने में अभी समय लेंगे और शायद दशक लग जाएं। इसी बीच, भारत जैसे उभरते बाजारों को समष्टि स्थायीकरण, बफरों का निर्माण करने तथा असुरक्षा में कमी लाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। “बेहतर नीति पहला सुरक्षा कवच है जिसमें राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने, दिवालिया संहिता तथा आधार जैसे सुधारों और मुद्रास्फीति के विरूद्ध हमारी स्थिर लड़ाई पर ध्यानकेंद्रित करना शामिल है”।
- बाह्य असुरक्षाओं को कम करने के लिए भारत अंतर्वाहों को नियंत्रित करने के लिए उपाय कर रहा है, अस्थिरता को कम करने और पूंजीगत अंतर्वाहों में अचानक रुकावट को सहन करने में समर्थ होने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा आरक्षित निधियां अनुरक्षित करने के लिए समष्टि विवेकपूर्ण उपाय के रूप में विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप भी कर रहा है।
- इस समय में अन्य देशों के दृष्टिकोण और नीतियों के बारे में काफी अनिश्चितता को देखते हुए भारत जैसे देश को अधिक महत्वाकांक्षी हुए बिना संवेदनशील उपाय करने का प्रयास करना चाहिए जैसा हमने अभी तक किया है। यह भारत के सुदृढ़ और संधारणीय आधार का काम करेगा जैसे ही विश्व अर्थव्यवस्था गति पकड़ती है।
Source: rbi.org.in
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