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Rajanish Kant शुक्रवार, 31 जनवरी 2020
2018 में विश्व के वाणिज्यिक सेवा निर्यात में भारत का हिस्सा बढ़कर 3.5 प्रतिशत हुआः आर्थिक समीक्षा 2019-20

अप्रैल-सितंबर 2019 के दौरान कुल एफडीआई इक्विटी आवक में सेवा क्षेत्र ने 33 प्रतिशत की छलांग लगाई, विदेशी निवेश आवक 17.58 बिलियन डॉलर हुई, कुल विदेशी निवेश आवक दो-तिहाई हुई

बंदरगाहों पर जहाजों से माल उतारने-चढ़ाने का समय 2010-11 के 4.76 दिन से घटकर आधा 2.48 दिन हुआ

ई-वीजा पर विदेशी पर्यटकों के भारत आगमन में वर्ष दर वर्ष 21 प्रतिशत की वृद्धिः आर्थिक समीक्षा

अपने महत्व को बढ़ाते हुए सेवा क्षेत्र अर्थव्यवस्था तथा सकल मूल्यवर्धन (जीवीए) वृद्धि में लगभग 55 प्रतिशत हो गया है। भारत में कुल दो-तिहाई प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आवक हुई है और यह क्षेत्र कुल निर्यात का 38 प्रतिशत हो गया है। यह जानकारी आज केन्द्रीय वित्त तथा कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में प्रस्तुत आर्थिक समीक्षा 2019-20 में दी गई है। 33 राज्यों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों में से 15 में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी सकल राज्य मूल्यवर्धन के 50 प्रतिशत को पार कर गई है।
आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि अप्रैल-सितंबर 2019 के दौरान सेवा क्षेत्र ने कुल एफडीआई इक्विटी आवक में 33 प्रतिशत की छलांग लगाई है और यह आवक 17.58 बिलियन डॉलर पहुंच गई है। ऐसा सूचना तथा प्रसारण, विमान परिवहन, दूर-संचार, परामर्श सेवाओं तथा होटल और पर्यटन जैसे उप-क्षेत्रों में मजबूत एफडीआई आवक के कारण हुआ है।
आर्थिक समीक्षा में रेखांकित किया गया है कि हाल के वर्षों में वस्तुओं के निर्यात से अधिक सेवाओं का निर्यात हुआ है। इस कारण विश्व की वाणिज्यिक सेवा निर्यात में भारत की हिस्सेदारी पिछले दशकों में बढ़ी है और यह 2018 में 3.5 प्रतिशत पर पहुंच गई है। यह विश्व के 1.7 प्रतिशत वाणिज्यिक निर्यात से दोगुना है।
बजट पूर्व समीक्षा में कहा गया है कि उच्च फ्रीक्वेंशी वाले विभिन्न संकेतक तथा विमान यात्री यातायात, रेल माल ढुलाई यातायात, बंदरगाह और जहाजरानी माल ढुलाई यातायात, बैंक ऋण, आईटी-बीपीएम (बिजनेस प्रोसेस मैनेजमेंट) क्षेत्र राजस्व, विदेशी पर्यटक आगमन तथा पर्यटन विदेशी मुद्रा आय जैसे क्षेत्रवार डाटा बताते हैं कि 2019-20 के दौरान सेवा क्षेत्र में नरमी आई है। लेकिन अच्छी बात यह है कि 2019-20 के प्रारंभ में सेवा क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) में सुधार हुआ है और अप्रैल-सितंबर 2019 के दौरान सेवा निर्यात की गति तेज बनी रही है। समीक्षा में दीर्घकालिक दृष्टि से सुझाव दिया गया है कि द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं के दौरान सेवा निर्यात पर फोकस करना भारत के लिए व्यापार साझेदारों के साथ द्विपक्षीय व्यापार घाटे को दूर करने के लिए शुभ है।
आर्थिक समीक्षा में सेवा क्षेत्र के अंदर उप-क्षेत्रों के महत्वपूर्ण विकासों को दिखाया गया हैः
  • पर्यटन सेवाः  यह क्षेत्र विकास को बढ़ाने वाला, जीडीपी में योगदान करने वाला, विदेशी मुद्रा कमाने वाला और रोजगार सृजन का प्रमुख ईंजन है, लेकिन वैश्विक रूझानों के अऩुरूप 2018 और 2019 में विदेशी मुद्रा आय वृद्धि में नरमी आई। ई-वीजा योजना को 169 देशों के साथ उदार बनाए जाने से ई-वीजा पर पर्यटकों का आगमन 2015 के 4.45 लाख विदेशी पर्यटकों की तुलना में 2018 में बढ़कर 23.69 लाख हो गया और यह जनवरी-अक्टूबर 2019 में 21.75 लाख रहा। इस तरह इसमें प्रति वर्ष 21 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
  • आईटी-बीपीएम सेवाः भारत का आईटी-बीपीएम उद्योग पिछले दो दशकों से भारत के निर्यात का ध्वजवाहक रहा है। आईटीबीपीएम उद्योग मार्च 2019 में 177 बिलियन डॉलर हो गया। रोजगार वृद्धि और मूल्यवर्धन के माध्यम से यह क्षेत्र अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान करता है। आईटी-बीपीएम क्षेत्र में नवाचार को प्रेरित करने तथा प्रौद्योगिकी को अपनाने के लिए अनेक कदम उठाए गए हैं। इन कदमों में स्टार्टअप इंडिया, राष्ट्रीय सॉफ्टवेयर, उत्पाद नीति और एंजिल टैक्स से संबंधित विषयों की समाप्ति शामिल है। भारत की स्टार्टअप व्यवस्था प्रगति कर रही है और 24 यूनिकॉर्न के साथ यह विश्व में तीसरी सबसे बड़ी व्यवस्था बन गई है।
  • बंदरगाह तथा जहाजरानी सेवाः जहाजों से माल उतारने और चढ़ाने में लगने वाला समय दक्षता का प्रमुख सूचक है। यह 2010-11 तथा 2018-19 के बीच आधा घटकर 4.67 दिवस से 2.48 दिवस हो गया है।
  • अंतरिक्ष क्षेत्रः पांच वर्ष पूर्व प्रारम्भिक शुरूआत के बाद से भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में काफी प्रगति हुई है। अब साधारण मैपिंग सेवाओं से आगे अधिक सेवाएं मिल रही हैं। यद्पि अन्य देशों की तुलना में अंतरिक्ष कार्यक्रम पर भारत का खर्च कम है, लेकिन इसरो ने हाल के वर्षों में प्रति वर्ष लगभग 5-7 सेटेलाइटों को बिना किसी दोष के लान्च किया है।





(साभार- पीआईबी )
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Rajanish Kant
2019-20 में GDP वृद्धि 5% रहेगा: आर्थिक सर्वे 2019-20

जीडीपी की वृद्धि दर के 2020-21 में 6.0 से 6.5 प्रतिशत तक बढ़ने की संभावना, समीक्षा में सरकार से कहा गया कि वह सुधारों पर तेजी से काम करे

अप्रैल-नवंबर, 2019 के दौरान केन्द्र के लिए माल एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में 4.1 प्रतिशत की वृद्धि

औपचारिक रोजगार की हिस्सेदारी वर्ष 2011-12 में 17.9 प्रतिशत से बढ़कर 2017-18 में 22.8 प्रतिशत हो गई, जो अर्थव्यवस्था में औपचारिकीकरण को प्रतिबिंबित करती है

क्रूड की कीमतों में राहत से चालू खाता घाटा कम हुआ; वर्ष 2019-20 की प्रथम छमाही में आयात में कमी आई जो निर्यात में कमी से तीव्रतर है

मुद्रास्फीति की दर अप्रैल 2019 में 3.2 प्रतिशत से तेजी से गिरकर दिसंबर, 2019 में 2.6 प्रतिशत पर आ गई जो अर्थव्यवस्था में मांग संबंधी दबाव की दुर्बलता को दर्शाती है

वर्ष 2019-20 की पहली छमाही में कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर में मामूली सुधार देखने को मिला


सरकार ने कहा है कि पहले अग्रिम अनुमानों के आधार पर वर्ष 2019-20 में भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 5 प्रतिशत दर्ज की जाएगी। यह वर्ष 2019-20 की दूसरी छमाही में जीडीपी की वृद्धि दर में बढ़ोत्तरी को दर्शाती है। वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज संसद में आर्थिक समीक्षा, 2019-20 पेश की। इसमें कहा गया है कि जीडीपी की वृद्धि में कमी को विकास के धीमी गति के चक्र के भीतर समझा जा सकता है। वित्तीय क्षेत्र रीयल सेक्टर के विकास में बाधा बन रहा है।
आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि वर्ष 2019-20 की दूसरी छमाही में आर्थिक विकास की गति तेज होने में 10 क्षेत्रों का प्रमुख योगदान रहा है। इस वर्ष पहली बार निफ्टी में तेजी आना, शेयर बाजार में उछाल, एफडीआई की आवक में वृद्धि होना, वस्तुओं की मांग बढ़ना, ग्रामीण क्षेत्रों में खपत का अनुकूल माहौल, औद्योगिक गतिविधियों में फिर से तेजी आना, विनिर्माण में निरंतर सुधार होना, वाणिज्यिक या वस्तुओं का निर्यात बढ़ना, विदेशी मुद्रा भंडार में और अधिक वृद्धि होना और जीएसटी राजस्व के संग्रह की उल्लेखनीय वृद्धि दर इन 10 क्षेत्रों में शामिल हैं।
समीक्षा में कहा गया है कि जोखिम कम होने / बढ़ने दोनों का कुल आंकलन पर, भारत की जीडीपी वृद्धि दर के वर्ष 2020-21 में 6.0 से बढ़कर 6.5 प्रतिशत होने की उम्मीद है और इसमें सरकार से कहा गया है कि वह सुधारों पर तेजी से काम करने के लिए अपने मजबूत जनादेश का इस्तेमाल करे जिससे वर्ष 2020-21 में अर्थव्यवस्था फिर से मजबूत हो जाएगी।
समीक्षा में कहा गया है कि वर्ष 2019 वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए कठिन वर्ष था जिसमें विश्व के उत्पादन की वृद्धि दर का अनुमान 2009 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद सबसे कम गति का होकर 2.9 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया गया था, जो 2018 में 3.6 प्रतिशत और 2017 में 3.8 प्रतिशत था। अनिश्चितताएं हालांकि कम हो रही हैं लेकिन चीन और अमेरिका की संरक्षणवादी प्रवृत्तियों और अमरीका और ईरान के बीच भौगोलिक राजनैतिक तनावों के कारण यह कुछ हद तक अभी भी बढ़ रही हैं। वैश्विक निर्माण, व्यापार और मांग के लिए एक कमजोर माहौल के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की गति धीमी हो गई जिसमें वर्ष 2019-20 की पहली छमाही में जीडीपी की वृद्धि दर 4.8 प्रतिशत दर्ज की गई, जो 2018-19 की दूसरी छमाही में रही 6.2 प्रतिशत की दर से कम है। वास्तविक रूप से धीमी वृद्धि से उत्पन्न वास्तविक अचल निवेश में भारी गिरावट ने 2018-19 की दूसरी छमाही से 2019-20 की पहली छमाही में जीडीपी की वृद्धि दर को कमजोर कर दिया।
हालांकि वास्तविक उपभोग वृद्धि की वर्ष 2019-20  की दूसरी छमाही में जानकारी मिली जो सरकार के अंतिम उपभोग में महत्वपूर्ण वृद्धि से कम है साथ ही भारत के वैदेशिक क्षेत्र में 2019-20 की पहली छमाही में अधिक स्थितरता देखने को मिली है, जहां जीडीपी के प्रतिशत के रूप में चालू खाता घाटा (सीएडी) वर्ष 2018-19 के 2.1 से कम होकर 2019-20 की पहली छमाही में 1.5 पर आ गया है, प्रभावी विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) हुआ है, पोर्टफोलियो प्रवाहों की बहाली हुई है और विदेशी मुद्रा भंडारों में वृद्धि हुई है। क्रूड की कीमतों में राहत से वर्ष 2019-20 की पहली छमाही में आयातों में कमी आई है, जो निर्यातों में कमी से तीव्रतर है। मुख्यतः इसी से सीएडी में संकुचन हुआ है।
आपूर्ति पक्ष के संदर्भ में कृषि वृद्धि दर के कमजोर रहने के बावजूद, यह वर्ष 2018-19 की द्वितीय छमाही की तुलना में वर्ष 2019-20 की प्रथम छमाही में थोड़ी सी ऊपर रही है। खाद्य महंगाई में अस्थायी वृद्धि के कारण शीर्ष मुद्रास्फीति वर्ष 2019-20 की पहली छमाही में 3.3 प्रतिशत के स्तर से बढ़कर दिसंबर, 2019 में 7.4 प्रतिशत हो गई, जिसके वर्ष के अंत तक नीचे आने की उम्मीद है। दिसंबर, 2019 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक थोक मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति का बढ़ना मांग का दबाव बनने का संकेत है।
मांग बढ़ाने के प्रयास के तहत, वर्ष 2019-20 में मौद्रिक नीति में काफी राहत दी गई है और आरबीआई द्वारा रेपो दर में 110 आधार बिंदुओं की कटौती की गई है। अर्थव्यवस्था में वित्तीय दबावों को स्वीकार करते हुए सरकार ने दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) के तहत दिवाला समाधान प्रक्रिया को गति प्रदान करने तथा विशेष रूप से संकटग्रस्त रीयल एस्टेट और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) क्षेत्रों के लिए साख व्यवस्था में राहत प्रदान करने की दिशा में इस वर्ष अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। निवेश बढ़ाने के लिए, विशेष रूप से राष्ट्रीय अवसंरचना रूपरेखा के तहत, अमल में लाए गए महत्वपूर्ण उपायों से वर्ष 2019-20 की द्वितीय छमाही और 2020-21 में विकास के लिए हरित शाखाएं प्रल्वित होने की आशा है।
पिछले पांच वर्षों में वृहद आर्थिक स्थायित्व के साथ भारत की वृद्धि के रिकॉर्ड (7.5 प्रतिशत वार्षिक औसत वृद्धि दर) को देखते हुए अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने और 2024-25 तक 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में बढ़ने की संभावना है। वर्ष 2019-20 के आरंभिक आठ महीनों में निवल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और निवल विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) क्रमशः 24.4 बिलियन डॉलर और 12.6 बिलियन डॉलर रहा, जोकि वर्ष 2018-19 की समान अवधि में प्राप्त प्रवाह से अधिक रहा।
2019-20 की पहली छमाही में, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई (शीर्ष यानी हेडलाईन) महंगाई दर 3.3 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था, जोकि पिछले साल की दूसरी तिमाही से मामूली रूप से अधिक थी। प्रमुखतया आपूर्ति संबंधी कारकों की बदौलत दिसंबर, 2019 में शीर्ष महंगाई दर में 7.35 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी गई। बिना मौसम की वर्षा और देश के अनेक भागों में बाढ़ जैसी स्थितियों के कारण कृषि उपज पर असर पड़ा, जिससे खाद्यान्न के दामों में वृद्धि हुई। दूसरी ओर थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) महंगाई दर अर्थव्यवस्था में मांग के दबाव में कमजोरी को इंगित करते हुए, अप्रैल, 2019 में 3.2 प्रतिशत से काफी कम होकर दिसंबर, 2019 में 2.6 प्रतिशत रह गई।
रोजगार पर उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, नियमित मजदूरी/वेतनभोगी के रूप में औपचारिक रोजगार की हिस्सेदारी में वृद्धि देखी गई है और यह 2011-12 के 17.9 प्रतिशत से बढ़कर 2017-18 में 22.8 प्रतिशत हो गई। यह मजदूरी/वेतनभोगी में 5 प्रतिशत वृद्धि अंशकालिक कामगारों की हिस्सेदारी में 5 प्रतिशत कमी के कारण देखी गई है, जो अर्थव्यवस्था के औपचारिकीकरण को परिलक्षित करती है। इसके परिणामस्वरूप, समग्र संदर्भ में इस अवधि के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में 1.21 करोड़ और शहरी क्षेत्रों में 1.39 करोड़ सहित सामान्य स्थिति वर्ग में लगभग 2.62 करोड़, नई नौकरियां सृजित हुईं।
2019-20 में केन्द्र का वित्तीय घाटा 7.04 लाख करोड़ रुपये अनुमानित (जीडीपी का 3.3 प्रतिशत) था जबकि वर्ष 2018-19 में यह 6.49 लाख करोड़ रुपये (जीडीपी का 3.4 प्रतिशत) था। वर्ष 2019 के अप्रैल-नवंबर माह के दौरान अप्रत्यक्ष कर के सबसे बड़े घटक वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के संग्रह में 4.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। हालांकि केन्द्र के संचयी जीएसटी संग्रह में वृद्धि अक्टूबर, 2019 में शुरू हुई और नवंबर एवं दिसंबर, 2019 में भी जीएसटी संग्रह में वृद्धि बनी रही।
बैंक की साख में वृद्धि, जो 2018-19 की प्रथम छमाही में उठ रही थी, 2018-19 की दूसरी छमाही में कम होने लगी और 2019-20 की प्रथम छमाही में और कम हो गई। यह कमी खाद्येतर साख के सभी मुख्य खंडों में बनी रही, जबकि व्यक्तिक ऋण में निरंतर और मजबूत गति से वृद्धि जारी रही। हाल के महीनों में उद्योगों- एमएसएमई और भारी उद्योग दोनों - की साख की वृद्धि में भी कमी दर्ज की गई है। कृषि और सम्बद्ध गतिविधियां साख की उच्चतर वृद्धि से लाभान्वित हुई।
सेवा निर्यात की धीमी वृद्धि के बावजूद वर्ष 2019-20 में सेवा लेखा का व्यापार शेष सकारात्मक रहा है। सेवा लेखा में व्यापार अधिशेष वर्ष 2018-19 की पहली छमाही में 38.9 बिलियन डॉलर की तुलना में 2019-20 में 40.5 बिलियन डॉलर अनुमानित है।
निम्न चालू लेखा घाटा (सीएडी) देश की न्यूनीकृत बाह्य ऋण ग्रस्तता को दर्शाता है जिससे घरेलू आर्थिक नीति की बाह्य प्रभावों पर निर्भरता घट जाती है। सीएडी जो वर्ष 2018-19 में 2.1 प्रतिशत था, वर्ष 2019.20 की प्रथम छमाही में व्यापार घाटे में महत्वपूर्ण कटौती के कारण उसमें 1.5 प्रतिशत का सुधार हुआ है। वर्ष 2019-20 के शुरूआती आठ महीनों के दौरान देश में सकल और निवल एफडीआई प्रवाह वर्ष 2018-19 की तदनुरूपी अवधि में प्राप्त प्रवाह से अधिक रही है। वर्ष 2019-20 की पहली छमाही में निवल एफपीआई प्रवाह 2018-19 की पहली छमाही के 7.9 बिलियन डॉलर के बहिर्प्रवाह की तुलना में सबल 7.3 बिलियन डॉलर था।
परिवारों द्वारा अचल निवेश 14.3 प्रतिशत से घटकर 10.5 प्रतिशत रह जाना 2009-14 से 2014-19 के दौरान हुई समग्र अचल निवेश में गिरावट को दर्शाता है। दोनों अवधियों के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र में अचल निवेश जीडीपी के 7.2 प्रतिशत से मामूली घटकर 7.1 प्रतिशत रहा। हालांकि वृद्धि के चक्र को धीमा करने और विशेषकर हाल में जीडीपी और खपत में हुई कमी के लिए 2011-12 से 2017-18 की अवधि के बीच निजी कॉरपोरेट निवेश में जीडीपी के लगभग 11.5 प्रतिशत ठहराव रहने की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

(साभार- पीआईबी )
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Rajanish Kant
2014-15 और 2019-20 के बीच शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च GDP[ के 4% से बढ़कर 4.7% हो गया:आर्थिक सर्वे 2019-20

सामाजिक सेवाओं पर खर्च वर्ष 2014-15 और वर्ष 2019-20 के बीच जीडीपी के अनुपात के रुप में 1.5 प्रतिशत बढ़ा: आर्थिक समीक्षा

1.34 प्रतिशत औसत वार्षिक एचडीआई वृद्धि के साथ भारत तेजी से बढ़ते देशों में से एक बन गया है


केंद्रीय वित्त एवं कार्पोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज संसद में आर्थिक समीक्षा 2019-20 पेश की। समीक्षा में कहा गया है कि सामाजिक अवसंरचना पर निवेश समेकित विकास और रोजगार की पहली शर्त है। समीक्षा में सामाजिक रहन-सहन के प्रति सरकार का संकल्प प्रमुख हिस्स के रुप में शामिल है।
सामाजिक सेवाओं पर खर्च का प्रचलन
      आर्थिक समीक्षा के अनुसार केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सामाजिक सेवाओं पर खर्च वर्ष 2014-15 में 7.86 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वर्ष 2019-20 (बजट अनुमान) में 15.79 लाख करोड़ रुपये हो गया। सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात के रुप में सामाजिक सेवाओं पर खर्च वर्ष 2014-15 से वर्ष 2019-20 के दौरान 1.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 6.2 प्रतिशत से बढ़कर 7.7 प्रतिशत हो गया। शिक्षा पर खर्च वर्ष 2014-15 और वर्ष 2019-20 (बजट अनुमान) के बीच जीडीपी के 2.8 प्रतिशत से बढ़कर 3.1 प्रतिशत हो गया। इसी तरह बजट पूर्व दस्तावेज में बताया गया है कि स्वास्थ्य पर खर्च समान अवधि में जीडीपी के 1.2 प्रतिशत से बढ़कर 1.6 प्रतिशत हो गया है।   

मानव विकास
मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) में भारत का दर्जा वर्ष 2017 में 130वें स्थान से सुधरकर वर्ष 2018 में 129वां स्थान हो गया जिससे यह 0.647 मूल्य पर पहुंच गया है। 1.34 प्रतिशत के औसत वार्षिक एचडीआई वृद्धि के साथ भारत तेजी से बढ़ते देशों में शामिल है। ब्रिक्स देशों के समूह में भारत चीन (0.95), दक्षिण अफ्रीका (0.78), रुस (0.69), और ब्राजील (0.59) से आगे है। आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि मानव विकास में इस गति  को बनाए रखने और इसमें और तेजी लाने में सामाजिक सेवाओं के प्रतिपादन में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका महत्वपूर्ण है।

(साभार- पीआईबी )
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Rajanish Kant
व्यक्तिगत ऋण में लगातार तथा जोरदार वृद्धि दर्ज की गई: आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20

दिवाला एवं दिवालियापन संहिता से समाधान प्रक्रिया में सुधार  :  समाधान में लगने वाला समय घटकर एक-चौथाई हुआ

अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के जोखिम संसाधन पूंजी अनुपात (सीआरएआर) में सुधार हुआ : गैर निष्पादक संसाधन (एनपीए) अनुपात 9.3 प्रतिशत पर नियंत्रित

एनबीएफसी के लिए सीआरएआर सितम्बर, 2019 में 19.5 प्रतिशत स्थिर रहा, जबकि सांविधिक लक्ष्य 15 प्रतिशत था

केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज संसद में आर्थिक समीक्षा 2019-20 पेश की। आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि दिवाला एवं दिवालियापन संहिता (आईबीसी) से भारत में पहले के उपायों की तुलना में समाधान प्रक्रिया में सुधार हुआ है। आईबीसी प्रक्रियाओं में औसतन 340 दिन का समय लगता है, जबकि पहले 4.3 वर्ष का समय लगता था। साथ ही, एसएआरएफएईएसआई अधिनियम के तहत 42.5 प्रतिशत धनराशि की वसूली हुई, जबकि पहले 14.5 प्रतिशत वसूली होती थी।
आर्थिक समीक्षा में बताया गया कि अप्रैल, 2019 के 6.25 प्रतिशत से अक्टूबर, 2019 के 5.15 प्रतिशत तक 110 बेसिस प्वाइंट की कटौती के साथ 2019-20 में मौद्रिक नीति अनुकूल बनी रही। आर्थिक समीक्षा में बताया गया कि कम  महंगाई दर तथा निजी निवेश द्वारा घरेलू विकास को सशक्त बनाने की जरूरत से भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एनपीसी) द्वारा दर में कटौती करने का निर्देश मिला।
आर्थिक समीक्षा में बताया गया कि 2019-20 में व्यक्तिगत ऋण में निरंतर एवं जोरदार वृद्धि हुई, जबकि कुल मिलाकर बैंक ऋण की वृद्धि में कमी हुई है, जो अप्रैल, 2019 के 12.9 प्रतिशत से घटकर दिसंबर, 2019 में 7.1 प्रतिशत रह गया। आर्थिक समीक्षा में बताया गया कि मौद्रिक वितरण कमजोर रहा है। उदाहरण के लिए, आर्थिक समीक्षा में बताया गया कि ऋण का प्रसार यानी रेपो रेट तथा वेटेड औसत ऋण दर (डब्ल्यूएलआर) के बीच का अंतर इस दशक में सर्वोच्च स्तर पर है।
इसके अलावा, आर्थिक समीक्षा में बताया गया कि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों का सीआरएआर मार्च एवं सितम्बर, 2019 के बीच 14.3 प्रतिशत से बढ़कर 15.1 प्रतिशत हो गया है। इसी तरह अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के लिए संसाधनों पर रिटर्न की भरपाई 2019-20 की पहली छमाही के दौरान  (-) 0.1 प्रतिशत से 0.4 प्रतिशत हो गई। आर्थिक समीक्षा में बताया गया कि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों का सकल गैर निष्पादक अग्रिम धन (जीएनपीए) का अनुपात मार्च, 2019 से लेकर सितंबर, 2019 तक 9.3 प्रतिशत पर स्थिर बना रहा।   
इसके अलावा, आर्थिक समीक्षा में बताया गया कि क्षेत्र का सीआरएआर सितंबर, 2019 में 19.5 प्रतिशत पर था, जबकि 15 प्रतिशत की सांविधिक आवश्यकता थी, जो बताता है कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) पर जोर दिया जा रहा है, क्योंकि जीएनपीए मार्च, 2019 के 6.1 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर, 2019 में 6.3 प्रतिशत हो गया।
बजट-पूर्व समीक्षा में बताया गया कि जुलाई एवं अगस्त में विदेशी विनिमय संबंधी विक्रयों की कुछ कहानियों के बावजूद, जून, 2019 में प्रणालीबद्ध तरलता पर्याप्त रही। समीक्षा में बताया गया कि 2019-20 की पहली छमाही में कच्चे तेल की कीमत घटने, अतिरिक्त तरलता तथा यूडी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति में बदलाव के कारण 10 वर्ष के मानदंड जी-सेक में नरमी देखी गई। यह धीरे-धीरे चलता रहा चलता रहा और दिसंबर, 2019 में 6.8 प्रतिशत पर बना रहा, क्योंकि एमपीसी ने रेपो दरों में कोई बदलाव नहीं किया।   
समीक्षा में बताया गया कि दिसंबर, 2019 में रिजर्व मनी में 13.2 प्रतिशत वृद्धि हुई, जबकि विस्तृत तौर पर धन की वृद्धि 2009 से गिरावट के लक्षण को पीछे छोड़ते हुए वृद्धि की ओर गतिमान रही। इसी प्रकार, पूंजी बाजारों में प्राथमिक बाजारों से कुल पब्लिक इसू में अच्छे संकेत मिले, जिसमें लगभग 30,000 करोड़ रुपये तक वृद्धि हुई। भारतीय बाजारों में विदेश पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) द्वारा कुल निवेश 7.8 बढ़कर 31 दिसंबर, 2019 को 259.5 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया। समीक्षा में यह भी बताया गया है कि 2019-20 के दौरान भारत के बेंचमार्क सूचकांक निफ्टी-50 और एसएंडपी बीएसई सेंसेक्स अभूतपूर्व ऊंचाई पर रहे।



(साभार- पीआईबी )
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